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क्या ट्रेड यूनियनों का हड़ताल सरकार की नीति बदल सकती है ?

जवाब मिला-जुला हो सकता है। ‘हाँ’ वाले यह बताने में नाकाम रहते हैं कि कब और कैसे सरकार को अपने अनुकूल कर लेंगे ?

आज पूरे भारत में ग्यारह ट्रेड यूनियन हड़ताल रूपी प्रक्रिया के हिस्सा हैं। इस बारे में कुछ बड़बोले पत्रकार काफी कुछ लिख चुके हैं। बीबीसी के एक खबर के मुताबिक़ इसका व्यापक असर केरल और कर्नाटक में देखने में मिला है। खैर ……

मुझे याद है जब पटना में गांधी मैदान में सरकार का विरोध करने के लिए भाकपा-माले द्वारा एक रैली प्रकार के हड़ताल का आयोजन हुआ था। लाइब्रेरी से घर लौटते समय वहाँ मौजूद कुछ मजदूरों से बात मालूम चला कि वे दिहाड़ी हैं और पार्टी के लोगों द्वारा कहने पर यहां आये हैं।
मैंने जब दूसरा सवाल पूछा कि इसका क्या मकसद है ?
तो उसका जवाब अचंभित करने वाला था – केवल मुझे इतना बताया गया है कि वहाँ खाना मिलेगा और दिनभर रहना है इसलिए मैं अपने पूरे परिवार को लेकर आ गया।

हड़ताल,रैली आदि के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टियां कमजोर और निराश मजदूरों को अपनी राजनीतिक फायदे के उद्देश्य से खाने का लालच देकर एक दिन का मजदूरी से वंचित करने का जो षडयंत्र रचती रही है,यह उनसब कारणों में से एक है जो इनके विकास को अवरोधित कर रही है।

इसमें कोई गुरेज नहीं या कहने में कोई संशय नहीं कि इन भोले-भाले मजदूरों को धमकाकर हड़ताल के लिए प्रेरित किया जाता होगा। यह आशंका और बलवती हो जाती है जब हम केरल के उन घटनाओं को याद करते हैं जिसमें वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी जनाधार गिरता देख संघ के स्वयंसेवकों पर कातिलाना हमला किया जाता है।

पर इसके दूसरे पहलू पर ध्यान देना भी जरूरी है – श्रमिक संगठनों की मांग है कि न्यूनतम मजदूरी को कम से कम 18,000 प्रति माह किया जाए। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र के लोगों समेत सभी श्रमिकों के लिए पेंशन कम से कम 3000 रुपया मासिक किया जाए। यह मांग कितना वाजिब है समीक्षा का विषय हो सकता है।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियंस कांग्रेस (एटक) और सीटू जैसे संगठन हड़ताल में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। यूनियनों का मानना है कि मोदी सरकार का नीतियां निजीकरण को बढ़ावा देगी जिसका कर्मचारियों की नौकरियों पर बुरा असर पड़ेगा। इससे मज़दूर वर्ग में असुरक्षा का माहौल बनेगा।

लेकिन मेरा मानना है कि ये संगठन आज भी उसी पुरानी तरीके से चल रहे हैं जो 100 से 200 साल पुराना है। आज राज्य का स्वरुप बदल गया है और लोकतांत्रिक राज्य एक कल्याणकारी राज्य के रूप में अपना पहचान बना रहे हैं और कई तो बना चुके हैं जिसमें मजदूरों और वंचित तबकों आदि का खासा ध्यान रखा जा रहा है।

–  सुरेश कुमार पाण्डेय

Source: Business sandesh

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