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तंबाकू उत्पादों पर उच्च टैक्स दर

यह जानी हुई बात है कि तंबाकू और तंबाकू उत्पादों को दुनिया भर में “सिन गुड्स”  (पापी वस्तु) के रूप में जाना जाता है क्योंकि जन स्वास्थ्य पर इनका गंभीर प्रतिकूल प्रभाव होता है। व्यावहारिक रूप से दुनिया भर के सभी देशों में तंबाकू उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लगता है। इसका मकसद एक तरफ अगर ज्यादा टैक्स कमाना होता है तो दूसरी तरफ इसके उपयोग को हतोत्साहित करना होता है। टैक्स की ज्यादा दर तंबाकू का उपयोग कम करने में खासतौर से उपयोगी होती है खासकर उन लोगों में जो आसानी से इसका सेवना शुरू कर देते हैं। जैसे युवा, गर्भवती महिलाएं, कम आय वाले धूम्रपानकर्ता और खैनी तथा गुटका का उपयोग करने वाले।

सांसद, डॉक्टर, तंबाकू पीड़ित और जन स्वास्थ्य का ख्याल रखने वालों ने जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) कौंसिल से अपील की है कि जीएसटी के तहत हर तरह के तंबाकू उत्पादों पर 40 प्रतिशत की उच्च टैक्स दर लगाने की अपील की है। इनमें सिगरेट, बीड़ी और खैनी व गुटखा शामिल है ताकि इनके उपयोग और भारतीयों में इनकी लत को हतोत्साहित किया जाए।

जीएसटी जैसा व्यापक आर्थिक सुधार सरकार को तंबाकू पर समान रूप से टैक्स लगाने का एक अनूठा मौका देता है और यह 40 प्रतिशत की सर्वोच्च जीएसटी दर हो सकती है और यह लाखों भारतीयों को तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण समय से पहले मरने से बचा सकता है।

पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के सांसद दिनेश त्रिवेदी ने कहा, सरकारको चाहिए कि जीएसटी लागू होने के बाद तंबाकू को खूब महंगा कर दे। ऐसे उत्पाद पर सबसिडीदेने का कोई मतलब नहीं है जो अपने प्रत्येक दूसरे उपयोगकर्ता को समय से पहले मार देता है।

बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सांसद अश्विनी कुमार चौबे ने कहा,बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में मैंने गुटखा पर प्रतिबंध लगा दिया था और बीड़ी समेत तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ा दिए थे। मुझे यकीन है कि जीएसटी कौंसिल तंबाकू को सर्वोच्च टैक्स की श्रेणी में रखेगा।

तंबाकू के उपयोग का देश में स्वास्थ्य व आर्थिक बोझ बहुत ज्यादा होता है। देश में हर साल कोई एक मिलियन लोग तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से मरते हैं। तंबाकू के कारण होने वाली बीमारियों की प्रत्यक्ष और परोक्ष लागत 2011 में 1.04 लाख करोड़ रुपए ($17 बिलियन) थी जो जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 1.16% है। अकेले तंबाकू से संबद्ध प्रत्यक्ष चिकित्सीय लागत राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यय का करीब 21% है। बेशक, तंबाकू के कारण होने वाला खर्च भारत सरकार / राज्य सरकारें तंबाकू पर उत्पाद शुल्क आदि से जो राजस्व प्राप्त करती हैं उससे ज्यादा है। (कुल स्वास्छ्य व्यय का सिर्फ 17 प्रतिशत है।)

वैसे तो उद्योग तंबाकू पर ‘सिन टैक्स’ (पाप कर) की सिफारिश 40 प्रतिशत की दर से करने का विरोध कर रहा है पर यह जानना महत्वपूर्ण है कि भारत में तंबाकू कराधान अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में बहुत कम है। आईआईटी जोधपुर में असिस्टैंट प्रोफेसर डॉ. रिजो जॉन के मुताबिक,विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में सिगरेट पर मौजूदाटैक्स की दर उसकी खुदरा बिक्री की कीमत की तुलना में श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसीदेशों की तुलना में भी कम हैं। विश्व में इसका स्थान 80 वां है। 40% जीएसटी + मौजूदा दर सेकेंद्रीय उत्पाद शुल्क तंबाकू उत्पादों पर टैक्स के मौजूदा भार को बनाए रखेगा। यह भीमहत्वपूर्ण है कि राज्य तंबाकू उत्पादों पर टॉप अप टैक्स लगाने के अपने अधिकार कायम रखेंताकि तंबाकू और तंबाकू के उत्पादों को समय के साथसाथ महंगा बनाया जा सके जिससे वेआम आदमी की पहुंच में रहें।

टाटा मेमोरियल हॉस्पीटल, मुंबई में ऑनकोलॉजिस्ट डॉ. पंकज चतुर्वेदी ने कहा, जीएसटी मेंमुझे बीड़ी (किसी भी तंबाकू उत्पाद) पर टैक्स सबसिडी देने की कोई तुक नहीं समझ में आती है।बीड़ी पर इस समय जो टैक्स संरचना लागू है उसके मुताबिक उपभोक्ता और राष्ट्र को नुकसान हैजबकि मुट्ठी भर कारोबारी परिवार (बीड़ी उद्योग के स्वामी) भारी मुनाफा कमा रहे हैं। बीड़ीउद्योग चलाने वाले ज्यादातर परिवार अच्छे राजनीतिक रसूख वाले हैं। न्य़ूनतम मजदूरी, बालमजदूरी, स्वस्थ कार्यस्थल आदि से संबंधित तमाम नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसअसंगठित उद्योग में उत्पाद शुल्क और कर उल्लंघन  बहुत ज्यादा है। यह चौंकाने वाली बात हैकि कई राज्यों में बीड़ी पर कोई टैक्स नहीं है। कायदे से जीएसटी शुरू होने के बाद तंबाकू के सभीउत्पादों पर खूब टैक्स लगना चाहिए।

वालंट्री हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया (वीएचएआई) की सीईओ भावना मुखोपाध्याय के मुताबिक, जीएसटी लागू होने के बाद कायदे से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि यह स्वास्थ्य केलिए खतरनाक पदार्थों जैसे सिगरेट, बीड़ी आदि की खपत के लिए ज्यादा टैक्स के जरिए बाधकके रूप में काम करे। तंबाकू और तंबाकू उत्पादों के सभी अंतर खत्म करके जीएसटी के तहतसर्वोच्च दर पर टैक्स लिया जाना चाहिए। क्योंकि टैक्स दर कम हुई तो उत्पाद सस्ते होंगे औरइनका सेवन आसान होगा खासकर उन लोगों के लिए जो गरीबी, अशिक्षा और दूसरे कारणों सेइसके लती हो जाते हैं। एक बार ऐसा हो जाए तो उनकी गरीबी भी बढ़ती है और वे गरीबी रेखा केनीचे चले जाते हैं।

तंबाकू के बाजार में बीड़ी का हिस्सा 48 प्रतिशत है (खैनी और गुटका के मुकाबले जो 38 प्रतिशत और सिगरेट 14 प्रतिशत है) और इसपर केंद्रीय तथा राज्य सरकारों का टैक्स बहुत कम रहा है और इसके लिए झूठा बहाना गढ़ा गया है कि ऐसा बीड़ी बनाने वालों की आजीविका सुरक्षित रखने के लिए किया गया है। हालांकि सच्चाई यह है कि टैक्स की कम दर और छूट का फायदा सिर्फ बीड़ी उद्योग मालिकों को है। अबुल कलाम आजाद जन सेवा संस्थान के सचिव नजीम अंसारी (उत्तर प्रदेश में करीब 6000 बीड़ी मजदूरों का प्रतिनिधित्व करते हुए) ने कहा, जीएसटी व्यवस्था मेंहम बीड़ी के लिए सर्वोच्च दर पर टैक्स की सिफारिश करते हैं और मांग करते हैं कि बीड़ी टैक्सकी इस राशि में से कुछ का उपयोग हमारी मजदूरी और जीवन स्थिति सुधारने के साथसाथआजीविका के वैकल्पिक साधन मुहैया कराने के लिए किया जाए।

पबलिक हेल्थ फ्रैटरनिटी ने जोर देकर कहा कि हर तरह के तंबाकू पर समान टैक्स और इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना महत्वपूर्ण है ताकि भारत की सबसे जल्दी प्रभावित हो सकने वाली आबादी को सुरक्षा मुहैया करा सकें। समय आ गया है कि सरकार भारत के 67.5 मिलियन बीड़ी पीने वालों को असमय होने वाली तकलीफदेह मौत से बचाया जा सके। एक स्वस्थ और उत्पादक नागरिक राष्ट्र निर्माण में ज्यादा योगदान करेगा और विश्व आर्थिक शक्ति बनने के भारत के सपने को पूरा करने में योगदान करेगा।

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(इस खबर को नवयुग संदेश टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

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