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पत्नी के शव को कंधों पर 12 किलोमीटर तक लेकर पैदल चलने वाले दाना मांझी पर लिखी गई कविता जरूर पढ़े

दाना मांझी

फर्ज समझकर दाना मांझी ,
आगे बढ़ता जाता था
कालाहांडी की सड़कों पर,
तिल-तिल मरता जाता था।।

गरीब पति के पति-धर्म ने,
पत्नी को सम्मान दिया;
लाश उठाए कन्धों पर वह
पौरुष भरता जाता था।।

माँ  की अर्थी बापू कन्धे
बेटी भूले अब कैसे;
बेटी के संग ओडिशा में
गम को सहता जाता था।।

भूखमरी और लाचारी ने
इंसाँ को मजबूर किया;
विकट घड़ी में देवों जैसे,
मांझी सजता जाता था।।

निर्धन ने निर्धनता में भी,
कर्ज दूध का अदा किया ;
संस्कारों से जीव-जगत में;
मिसाल बनता जाता था।।

– डॉ.पूर्णिमा राय,

Managing Editor

Business Sandesh Group

Source: Business Sandesh

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