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मानव जीवन में हार-जीत अथवा सफलता-असफलता का चक्र हमेशा चलता रहता है

मनुष्य को अपने बाहूबल पर पूरा भरोसा होना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास होगा तो वह किसी भी तूफान का सामना बिना डरे या बिना घबराए कर सकता है। वैसे तो ईश्वर मनुष्य को वही देता है जो उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उसके भाग्य में लिखा होता है। परन्तु फिर भी जो व्यक्ति स्वयं ही अपनी शक्ति पर भरोसा करता है, ईश्वर देर-सवेर उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके मालामाल कर देता है।
मनुष्य यदि थक-हारकर बैठ जाए अथवा रोता रहे तो न उसका भाग्य बदल सकता है और न ही उसका जीवन सफल हो सकता है। उद्यम तो उसे करना ही होता है। जिस प्रकार ताश के पत्तों से कभी घर नहीं बनाया जा सकता। उसी प्रकार से ही अनावश्यक प्रलाप करने या शेखचिल्ली की तरह मात्र दिवास्वप्न देखने से जीवन में उन्नति नहीं की जा सकती।
दुनिया को जीतने का हौंसला रखने वाले अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते। वे साहसी अपने विवेक का सहारा लेते हुए शेर की तरह अकेले ही दुनिया में आगे कदम बढ़ाते रहते हैं। यद्यपि एक बार असफल हो जाने पर यह दुनिया समाप्त नहीं हो जाती और न ही कोई मनुष्य हमेशा के लिए हार जाता है। इसी प्रकार एक बार अपने जीवन में सफल हो जाने वाले को सदा के लिए ही विजयी नहीं माना जाता।
मानव जीवन में हार-जीत अथवा सफलता-असफलता का चक्र हमेशा चलता रहता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि असफल हो जाने पर मनुष्य सदा के लिए जीवन की बाजी हार गया है। अथवा एक बार उसे सफलता मिल गई तो उसने जीवन में सभी ऊँचाइयों को सदा के लिए छू लिया है।
युद्ध यदि मात्र दिखावे के लिए भी हो अथवा सफलता निश्चित हो तो कायर-से-कायर व्यक्ति भी उसे लड़कर जीत जाता है। फिर वह विजयी होने का झूठा दम्भ भर सकता है और असत्य ही सही, सिर ऊँचा उठाकर चलने का साहस कर सकता है।
साहसी व्यक्ति वही होता है जो असफलता निश्चित होने पर भी युद्ध के मैदान में डटा रहता है, अपनी पीठ दिखाकर नहीं भागता और किसी भी परिस्थिति में वह अपने धैर्य का दामन नहीं छोड़ता।
कहने का तात्पर्य यही है कि हारने के डर से आगे बढ़ा हुआ कदम पीछे खींच लेने वाला मनुष्य तो मानो बिना लड़े ही युद्ध हार जाता है। ऐसा कापुरुष समाज में हमेशा तिरस्कार का पात्र बनता है। कितनी भी विशेषताएँ उसमेँ विद्यमान हों फिर भी कायरता के कारण उसे सम्माननीय स्थान नहीं मिलता। हर कोई उसे हिकारत की नजर से देखता है।
शारीरिक शक्ति के न होने पर भी जो मानसिक बल से सशक्त होते हैं वे किसी से भी भिड़ जाते हैं और सफल हो जाते हैं। शरीरिक बल हो पर व्यक्ति मन से सामना करने के लिए तैयार न हो तो सफलता सन्दिग्ध होती है। इसलिए ऋषि-मुनि ईश्वर से सदा मानसिक बल प्रदान करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
मन के मजबूत होने पर इन्सान हर प्रकार की चुनौतियों को ललकार सकता है। ऐसा मनुष्य किसी भी व्यक्ति के समक्ष अथवा कैसी भी परिस्थिति हो अडिग रहता है। ऐसे उच्च मनस्थिति वाले साहसी ही चमत्कार करते हैं। यही लोग दुनिया में अग्रणी रहते हैं। समाज को दिशा-निर्देश देते हैं। लोग इनका अनुकरण करके गौरव का अनुभव करते हैं।
मनुष्य को सदा साहसिक कदम उठाना चाहिए। उसे अपना आत्मविश्वास किसी भी मूल्य पर नहीं खोना चाहिए। जहाँ तक हो सके माँ को बचपन से ही बच्चे को स्वावलम्बी बनाना चाहिए। उसके मन में किसी प्रकार का डर हावी नहीं होने देना चाहिए। यदि बचपन से ही मन में डर घर कर जाए तो इन्सान आयु पर्यन्त साहसिक कार्य नहीं कर सकता।
मनुष्य को जीवन की चुनौतियों के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए बल्कि उससे टक्कर लेकर उसे मात देनी चाहिए। अपने मनोबल को बढ़ाने के लिए वीरों की गाथाएँ पढ़नी चाहिए।
– चन्द्र प्रभा सूद

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