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शिक्षा की भूमिका और हमारा देश

‘ज्ञानम् मनुजस्य तृतीयम् नेत्रम्”, वैदिक काल से ही शिक्षा को वह प्रकाश माना गया है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रकाशित करने का सामर्थ्य रखता है | यह एक निर्विवाद सत्य है कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र या समाज की प्राणवायु है , उसकी प्रेरणा है ,उसकी ऊर्जा है और किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके द्वारा हासिल किए गए शैक्षिक स्तर पर ही निर्भर करता है |
यदि सीधे तौर पर देखा जाए तो शिक्षा से सीधा मतलब ज्ञान और तथ्यों की समझ जागृत करना है | हम जानते हैं कि शिक्षा विकास का आधारमूलक सत्य है | इसीलिए तो शिक्षाविहीन समाज से विकसित राष्ट्र की कल्पना करना किसी भी देश के लिए सम्भव नहीं हैं | शिक्षित समाज ही राष्ट्र विकास की अवधारणा को साकार करने मे समर्थ है | हम इंसान जन्म से लेकर अपने अस्तित्व के धूमिल होने तक शिक्षारत रहते हैं , बस यही कुछ बदलाव है तो वह है ”शिक्षा का स्वरूप ” और यही से शिक्षा की भूमिका की शुरूआत होती है जो किसी भी देश के लिए काल निरपेक्ष नहीं वरन् काल सापेक्ष होती है | तो हमारा देश इससे अछूता कैसे रह सकता है ?
”गांधी ,गाँव और गरीब” को अपनी प्रेरणा मानने वाले विद्वानजन और शिक्षा पर बेतहाशा बढते जा रहे खर्च और आधारभूत शैक्षिक सुविधाओं के अभाव और शिक्षा प्रणाली के तमाम विवादों के बीच यह सवाल और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि असली भारत क्या है ? उसकी बुनियादी जरूरतें क्या हैं ? लेकिन इस पर सोचे कौन , किसे मतलब है ? वही ढाक के तीन पात वाली सरकार की मंशा जो तमाम उपायों के बावजूद नौकरशाही के सडे गले अंशों के बीच रेंग रहे हैं | तो फ़िर उपाय क्या है ? सीधी बात है -”कुछ सरकार करे और कुछ हम करें ” तभी बात बन सकती है | हाँ , पूरे भारतवर्ष के लिए शिक्षा के एक ही माडल या नियामक नहीं हो सकते | दक्षिण भारत जहाँ साक्षरता अधिक है वहाँ वहाँ का माडल हम पूर्वोत्तर राज्यों में लागू नहीं कर सकते | हाँ , हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया मे जहाँ कहीं भी क्रांति हुई है , बड़ा सामाजिक परिवर्तन हुआ है या आर्थिक विकास हुआ,स्थानीय भाषा मे काम करने से हुआ है | ज्ञान के भंडार का अवतरण अगर जनभाषा मे नहीं होता है तो किसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की बात करनी बेमानी ही है |
समतामूलक समाज या विकसित राष्ट्र का निर्माण कैसे हो सकता है जब ज्ञान एक खास वर्ग तक ही सीमित हो , शिक्षा इतनी महँगी हो जाए कि आम नागरिक उसे हासिक ही ना कर सके|
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि मानव की जितनी भी उपलब्धियाँ हैं शिक्षा उनमे सबसे बढकर है | अंग्रेजी के लोभपूर्ण आतंक के आगे सोचना पड़ जाता है कि जिस प्रकार गुण के बिना रूप और उपयोग के बिना धन व्यर्थ है , ठीक उसी प्रकार विनम्रता के बिना विद्या , ज्ञान या शिक्षा व्यर्थ है | अंग्रेजी न जानने की वजह से हीन भावना के उपजने की बहुश्रुत कहानी इसी बात से ताल्लुक रखती है | यहाँ उद्देश्य अंग्रेजी के महत्त्व को कम करके आंकना या अंग्रेजी को बुरा साबित करना नहीं है | बल्कि यह सोचना पडेगा कि ‘गांधी ‘ या ‘माओ’ ने अगर अपने-अपने समयों और समाजो को झकजोर कर रखदिया तो एक जनभाषा के बूते पर ही कर सके | ऐसी शिक्षा का क्या अर्थ है जो विचारों का क्रियान्वयन न कर सके, चरित्र का निर्माण न कर सके, कोई सुंदर कल्पना न कर सके |
किसी लेखक ने लिखा भी है —
*बच्चों के नन्हे हाथों को चाँद सितारे छूने दो*
*चार किताबें पढकर ये भी हम जैसे हो जायेंगे*
हाँ , इतना जरूर हुआ है कि शिक्षा को प्रचारित प्रसारित करने वाली तकनीकें और माध्यमों का विस्तार हुआ है | पाठ्य पुस्तकें , समाचार पत्र , रेडिओ टेलीविजन, और अब तो इंटरनेट भी जानकारियां देने और सूचना पहुँचाने के ही माध्यम हैं भारत मे किसी भी युग मे शिक्षा के इतने संसाधन शायद ही रहे हैं | परंतु यह भी उतना ही सच है कि शिक्षा के क्षेत्र मे विसंगतियां घटने या खत्म होने के बजाय बढती ही गईं |
शिक्षित वर्ग यानी ज्ञानियों और जनसाधारण के बीच आज भी सार्थक संवाद स्थापित नहीं हो पाया |
*दुख की पिछली रजनी बीच*
*विकसित सुख का नवल प्रभात*
जैसी उत्साहपूर्ण पंक्तियों से शुरू हुई यात्रा आज भी नवल प्रभात की मंजिल हासिल नहीं कर पाई है | झुग्गियों ,मलिन बस्तियों और गरीब गाँवों मे रह रही आबादी इस सच्चाई का हर पल सामना करती है |
जाहिर है कि इन वंचित वर्गों तक शिक्षा की कितनी पहुँच है , इनके जीवन मे शिक्षा की कितनी भूमिका है | इसके लिए ठोस और कटिबद्ध प्रयास करना निहायत जरूरी है न कि हवाई सर्वेक्षण | एक शिक्षित समाज मेल – जोल सामूहिकता या एकीकरण की अनिवार्य भावनाओं का बोध कहीं अधिक गहराई और तीव्रता से कर सकता है | शिक्षा ही यह भूमिका अदा कर सकती है कि भारत विकास के पथ पर लगातार आगे बढता रहे , भारत के नागरिक मानव जीवन के चरम लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा मे अग्रसर हों , और भारत पुन: ज्ञान गुरू का दर्जा प्राप्त कर सके — तभी तो मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है —
*” आए नहीं थे स्वप्न मे भी जो किसी के ध्यान में*
*वे प्रश्न पहले हल हुए थे एक हिंदुस्तान में |”*
कुल मिलाकर बात इतनी कि नागरिकों का शिक्षित होना एक प्रकार से सुशासन एवं पारदर्शिता को जन्म देता है | शिक्षा की भूमिका भी यही है कि यह सद्गुणो और सद् विचारों को बढावा दे | शिक्षा मानवता की प्रशंसनीय उपलब्धि है और शिक्षा की मुख्य भूमिका देश,समाज और मानवता की जटिलताओं को सुलझाने मे निहित है यही सच्ची शिक्षा है और यही मनुजत्व भी |
राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा भी है –
*”है सच्चा मनुजत्व ग्रंथियां सुलझाना जीवन की ”*

– संजीत सिंह

Source: Business Sandesh

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