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बच्ची की डेड बॉडी के साथ अस्पताल ने बाप को थमाया 15 लाख का बिल

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देश के मेडिकल सिस्टम की क्या हालत है इसका एक जीता जागता उदाहरण सामने आया है। देश में इलाज की व्यवस्था कैसी है इसका अंदाजा इस घटना के बारे में पढक़र आप खुद ही लगा लीजिए। आज के वक्त में मध्यवर्गीय या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग महंगा खर्च सुनकर बेहतर इलाज के बारे में सोच भी नहीं सकते। दुनिया में डॉक्टर को सैकंड गॉड कहा जाता है। कहते हैं डॉक्टर ही इंसान की जिंदगी के लिए आखिर तक लड़ता है। लेकिन, इस दौर के मेडिकल सिस्टम से जुड़े लोगों से ऐसी उम्मीद रखना गलत ही साबित होता जा रहा है।

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नया मामला गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल से जुड़ा है। जहां डेंगू से पीडि़त सात वर्षीय बच्ची आद्या के पिता को डेथ बॉडी के साथ 15 लाख 79 हजार 322 रुपए थमा दिया गया। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि बिल 15 दिन का बताया जा रहा है। इतना ही नहीं बच्ची ने मौत के वक्त जो ड्रेस पहन रखी थी उस तक के पैसे मांग लिए गए। इस ड्रेस का बिल 900 रुपए बताया गया। इतना पढक़र ही आप अंदाजा लगा लीजिए कि बच्ची के मां बाप पर क्या बीत रही होगी।  आगे की घटना के बारे में पढ़ेंगे तो आपकी कंपकंपी छूट जाएगी।

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दरअसल, गुरुगाम के द्वारका सेक्टर-12 में रहने वाले जयंत की सात वर्षीय बेटी आद्या को बुखार हुआ था तो उन्होंने शहर के प्राइवेट अस्पताल में बच्ची को भर्ती करवाया। लेकिन, अस्पातल में उसे डेंगू (डेंगू-4) बताया गया। उस अस्पातल के डॉक्टरों ने बच्ची की हालत देखते हुए उसे ऐसे अस्पताल में ले जाने की सलाह दी जहां पिडिएट्रिक आईसीयू यानि बाल चिकित्सा आईसीयू हो। जयंत बच्ची को फोर्टिस अस्पताल लेकर पहुंचे।

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जयंत का कहना है कि जब अस्पातल लेकर गए तो बच्ची अच्छी तरह बोल रही थी। दो दिन के अंदर ही उसे वेंटिलेटर पर ले लिया गया और तीसरे दिन तो डायलिसिस देना शुरु कर दिया। जयंत का कहना है कि 24 घंटे में डॉक्टर सिर्फ पांच मिनट बात करते थे। वो हमें बच्ची की कंडीशन के बारे में सही नहीं बताते थे। हमने देखा कि बच्ची के शरीर पर नीले निशान थे। जब हमने डॉक्टर से इस बारे में कहा तो उन्होंने कहा कि यह दवाईयों का असर है, टेंशन लेने की कोई बात नहीं है। जबकि हमने देखा की बच्ची की आंखे पीली पड़ती जा रहीं थीं।

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आखिर हमारे कई बार कहने के बाद डॉक्टरों ने आद्या की सिटी स्कैन और एमआरआई करवाई और कहा कि बच्ची में अब कुछ नहीं बचा है। लेकिन, अभी बच्ची की धडक़न चल रही है तो आप अन्य अस्पताल में पूरे शरीर का प्लाजमा प्रत्यारोपण करवा सकते हैं। बच्ची के पिता ने आरोप लगाया कि इतना होने के बावजूद हमने बच्ची को वेदांता हॉस्पिटल ले जाने की सोचा तो अस्पताल प्रशासन ने हमें औपचारिकता के नाम पर पूरे आठ घंटे परेशान किया। इतना होने के बावजूद अस्पताल की मेडिकल टीम ने कहा कि हम बच्ची का डेथ सर्टिफिकेट नहीं देंगे क्योंकि बच्ची की सांसे चल रही हैं।

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आखिर वो बच्ची को वापस उसकी प्राइवेट अस्पातल लेकर गए और अस्पातल ने पूरे टेस्ट के बाद बच्ची को मृत घोषित कर मृत्यू प्रमाणपत्र दिया। जयंत ने कहा कि इलाज के दौरान शुरु में 31,00 से लेकर 500 रुपए तक के इंजेक्शजन रोज लगाए गए। बिल में 15 दिन के इलाज के दौरान सीरींज, साधारण ग्लव्ज और सिजेरियन ग्लव्जों का भी जिक्र है। ऐसी कई पेचीदा बाते हैं जो मामले को गंभीर और संदिग्ध बनाती हैं। इन चीजों को आधार बनाकर बच्ची के पिता जयंत अस्पातल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की बात कह रहे हैं। जयंत कहते हैं कि जैसा मेरे साथ हुआ ऐस भगवान ना करे किसी के साथ हो।

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