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क्या हम आज़ाद हैं?

15 अगस्त 2017 -71वाँ स्वतंत्र दिवस। कहने को हमें आज़ाद हुए 70 साल हो चुके हैं जिसका जश्न हम प्रतिवर्ष 15अगस्त को मनाते हैं। पर क्या हम सही मायने में आज़ाद हैं?
जिस देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार न हो; जहाँ आज भी ईमान-धर्म के नाम पर भेद-भाव किया जाता हो; जहाँ गरीबी, अत्याचार आज भी अपनी जड़ों से जकड़े हुए हों; जहाँ अब तक औरतों को खुलके साँस लेने तक की आज़ादी न हो; जहाँ प्रजातंत्र के नाम पर प्रजा पर ही झूठे वादों -कस्मों के तंत्र-मंत्र चलाए जाते हों; जहाँ बॉर्डर पर लड़ रहे वीर सिपाही से ज्यादा मूवी में वही किरदार निभा रहे एक आम आदमी को हीरो या सच्चा देशभक्त तक करार कर दिया जाता हो; जहाँ शहीद हुए, वीरगति प्राप्त हुए हुमारे जवान भाई के परिवार वालों की हिम्मत व दुःख से अधिक हमें नेताओं या बॉलीवुड सितारों की जिंदगी में हो रहे किस्सों की फिक्र रहती हो; जहाँ न तो महलों में रेशम सी चादर पर सो रहे लोग सुरक्षित हैं न ही फुटपाथ पर ठिठुरते अपने कोरे बदन को ढकते वो लोग जिन्हें गरीबी ने अपने पैरों तले लाचार व कमज़ोर बना रखा है, वो लोग सुरक्षित हैं, जो हर रात अपने मन को झूठी तसल्ली देकर चैन की नींद सोने की कोशिश करते हैं। क्या ऐसा देश आज़ाद कहलाने लायक है? जिस देश के 50% नागरिकों को पढ़ने-लिखने, खाने-पीने, यहाँ तक कि जीने की भी आज़ादी न हो, वो देश स्वतंत्र कैसे हो सकता है? आज भी जहाँ के देशवासियों की रूढ़िवादी और ओछी सोच व संकीर्ण विचारों के तले न जाने कितने बेगुनाह मासूम लोग कुचले जाते हैं, वो देश आज़ाद नहीँ हो सकता।
हमारे भारत देश को अपनी सोच को बदलने की ज़रूरत है जिसने हज़ारों को अपनी जंजीरों में जकडा हुआ है। कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला हमारा भारत खुदकी ही महज़ सोच के कारण पिछड़ता जा रह है। हमें ज़रूरत है अब कुछ कदम बदलाव की ओर बढ़ाने की, खुले दिमाग से सोचने की, अपने युवा जोश को होश में सही दिशा देने की। महज़ एक सोच हमारे देश का भविष्य बदल सकती है। अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप अगले साल इन्हीं कमियों -उनकी खामियाजों को बड़े बड़े काले अक्षरों में पढ़ते रहना चाहते हैं या अपने सुकर्मों व बड़ी सोच से इतिहास रचकर अपना भविष्य आज़ाद करना चाहते हैं।
जय हिन्द! जय भारत !
– श्रेया खण्डेलवाल 
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