Breaking News
Home / देश / नारी हूँ, अबला नहीं

नारी हूँ, अबला नहीं

रोज़ सवेरे अखबार में हम औरतों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों की ख़बरें बड़े – बड़े काले अक्षरों में पड़ते हैं । कभी कन्या भ्रूण हत्या तो कभी गेंग रेप, कभी कचरा पात्र में मिली नवजात तो कभी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूझ रही एक पीडिता । ऐसे ही न जाने कितने अनगिनत वारदातें हैं जिन्हें हम रोज़ाना पढ़कर उन अपराधियों को थोड़ा कोसते हैं और उन पीडित महिलाओं की ओर अपनी सहानूभूति जताते हैं । लेकिन आगे क्या? हमें सहानूभूति नहीँ साथ चाहिये, समर्थन चाहिये ।

इस संसार की उस सोच से लड़ने की हिम्मत चाहिये जिसने हमें अपनी जंजीरों में जकड़ा हुआ है । हमें ज़्यादा कुछ नहीँ, केवल अपना सम्मान और आत्मविश्वास चाहिये, जो इस पुरुषवादी संसार की ओछी सोच और संकीर्ण  विचारों से होने वाले दुष्कर्मों के तले दब गया है । आशा है इस कविता के ज़रिये कुछ लोगों की सोच में बदलाव आये । जिस औरत को ये संसार मंदिरों में मूर्ति बनाकर पूजता है और बाहर उसी का तिरस्कार कर पैरों की धूल समझता है, जिसके न होने से इस संसार की प्रगति पर भी विराम लग सकता है, फ़िर  भी उससे उसके जन्म लेने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, आशा है उसे वो सारे हक मिले जिसके साथ भगवान ने उसे बनाकर इस धरती पर भेजा है ।

नारी हूँ, अबला नहीं 

माँ ने देखे थे जो सपने मेरे लिये,
शीशे के सहस्त्र टुकड़े बनकर रह गये ,
ममता की भावना थी जो दिल में मेरे लिये,
अश्रुओं के मोती बनकर बह गये,
सोचा था बापू की उँगली थामे चलूँगी,
हाथ बढ़ाते ही शरीर गाड़ दिये गये ।

साँस तो लेने दी होती एक बार मुझे इस दुनिया में,
कदम तो रखने दिया होता मुझे अपनी मातृभूमि पे,
तारों से भी ऊँची ऊँचाइयाँ छूने का सपना था मेरा,
हर असम्भव को सम्भव करके दिखाना था मुझे,
समुद्र से भी गहरी गराइयों का मूआयना करना था मुझे,
किसी का संसार बसाके खुशनुमा बनाना था मुझे।

पंख फैलाने से पेहले ही काट दिये जाते हैं हमारे ,
पैरों में पायल की जगह बेडियाँ डाल दी जाती हैं,
विकास के नाम हमारी साँसें ही छीन ली जाती हैं,
नाजुक कलाइयों में लाल बेडियों का वज़न ढोहते हैं हम,
नन्हीं हथेलियों पे चूल्हा-चौकी से हुए छालों की जलन सहते हैं हम,
हर अत्याचार का काढ़ा बिन बोले ही पी जाते हैं हम।

मत तोडो हमारे सब्र का बाँध,
हम सहनशीलता की मूरत भी हैं,
तो शक्ती का स्वरूप भी हैं,
हम अपनों के लिये त्याग करना भी जानते हैं,
तो अपने स्वाभिमान के लिये लड़ना भी जानते हैं।

अभिमान की जो दीवार खड़ी की है समाज ने,
एक पाहन के हिलाते ही ढह जयेगी वो,
अपने औचित्य को सिध्द करने निकल गए हम अगर,
आखरी श्वास तक इस गंदगी को निगल जायेंगे हम,
तब, जब तक नभ में सूर्य-चंद्र का प्रकाश रहेगा,
तब तक हमारी मुट्ठी मैं तिनका-तिनका रहेगा।

बहुत हुए सलाह-मष्वरे ,
समय है अब कुछ कर दिखाने का,
इस पुरुषवादी संसार में अपनी जगह बनाने का,
टूट चुका अब हुमारे सब्र का बाँध,
अब हम हैं शक्ति, दुर्गा हम हीं।
हम हैं विद्या, सरस्वती हम हीं ।।

श्रेया खण्डेलवाल

Loading...
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *