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शास्त्रों में वर्णित है नमस्कार करना

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जब आप किसी से मिलते हैं तो उसका अभिवादन के लिए आप उसे नमस्कार करते हैं। ऐसा करने वालों को संस्कारी माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं नमस्कार करने की क्रिया को शास्त्रों में भी स्थान दिया गया है। तो चलिए जानते हैं विस्तार से इसके बारे में-

शास्त्रों में पांच प्रकार के अभिवादन बताए गए हैंए जिनमें से एक प्रकार है नमस्ते और नमस्कार। संस्कृत में इसे विच्छेद करने पर आप पाएंगे कि यह दो शब्द नमः और असतश् से मिलकर बना है। नमः का मतलब होता है झुक गया और असते मतलब सर अहंकार या अभिमान से भरा, यानि मेरा अहंकार से भरा सिर आपके सम्मुख झुक गया।

वहीं, आध्यात्म की दृष्टि से मनुष्य दूसरे मनुष्य के सामने अपने अंहकार को कम कर रहा है।

हाथ जोड़कर नमस्कार करने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी माना जाता है। इससे शरीर में सकारात्मक उर्जा का तेजी से संचार होता है जो मानसिक शांति मिलती है और आत्मबल प्राप्त होता है। इससे क्रोध पर नियंत्रण बढ़ता है और स्वभाव में विनम्रता आती है।

इसके अतिरिक्त जब आप नमस्ते करते हैं तो उस समय दोनों हाथों को जोड़कर एक कर दिया जाता है। जिसका अर्थ है कि इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्तियों के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गए।

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