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आज मेरा जन्मदिन है, लेकिन मेरी हालत…

अक्षरों में है अकेलापन, शब्दों में है दोस्ती, वाक्यों में है संगठन और संगठन एक ताक़त।
कैसा लगा आप लोगों को मेरा परिचय, मैं हिंदी हूं, हिंदी जिसमें तुम्हारा बचपन खेला, जिसमें तुम्हारा यौवन बीता, जिसमें तुमने सपनें देखे, जिसमें तुमने प्रेम के गीत गाये।
आज मेरा जन्मदिन है, लेकिन मेरी हालत सरकारी स्कूल के उस ख़ाली बस्ते की तरह है जिसे टांगने वाले ज़्यादातर बच्चे क्लास के बाहर खड़े नज़र आते हैं। संविधान ने मुझे 1950 में राजभाषा होने का दर्जा तो दिया लेकिन मेरे अपनों ने मुझे कभी इज़्ज़त नहीं दी। बाहर से आई अंग्रेज़ी ख़ास हो गयी और मैं अपने ही घर में ग़ैर बन गई, वो तो भला हो कवियों का जिन्होंने अपनी कल्पनाओं में मुझे सांस लेने का मौका दिया, वो तो भला हो उन लेखकों का जिन्होंने अपनी कलम से मुझे सजाया सवारां। वरना इक्कीसवीं सदी में तो मुझे बोलने वाले ट्रेन के जनरल क्लास की बोगी बन गए और अंगरेज़ी बोलने वालों को A/C क्लास की हैसियत मिल गयी।
अब देखिये ना…. आप A से z एक सांस में पढ़ जाते हैं लेकिन क, ख, ग पढ़ने में सांस फूल जाती हैं।अब सांस तो फूलेगी न, पढ़ने  की आदत जो नहीं है। ख़ैर अब क्या अपनी कहानी का रोना रोया जाए, समझदारी इसी में है की ख़ुद को बचाने की लड़ाई लड़ी जाए।
घर के संस्कार, देश की सरकार और हिंदी से प्यार मुझे यानी आपकी अपनी भाषा को महफ़ूज़ होने का एहसास दिला सकता है। तो गर्व से बोलिये, हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा।

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– चौधरी ज़ाहिदा कबीर

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