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किसी सजा से कम नहीं है अकेलापन

अकेलापन मनुष्य के लिए किसी सजा से कम नहीं है, वह एक अभिशाप है। अकेलेपन का अहसास मनुष्य को भीतर तक तोड़ देता है। वह बिन बुलाए मेहमान की तरह बिना किसी आमन्त्रण के आ धमकता है और विदा होने का नाम नहीं लेता। घर के सदस्यों के द्वारा अनदेखा किए जाने पर भी वह किसी अड़ियल और ढीठ अतिथि की तरह जमकर बैठ जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि किसी के भी हृदय में वह अंगद की तरह पैर जमाकर गहरे बैठ जाता है।

कभी-कभार कोई व्यक्ति अपने कार्यों से थक जाता है या अस्वस्थ होता है या किसी परेशानी से जूझ रहा होता है, तब वह अकेला रहना चाहता है, झल्लाता है। वह कुछ समय शान्ति से जीना चाहता है। उसकी यह चाहत कुछ ही पल के लिए होती है। वह सदा के लिए कभी अकेले नहीं रहना चाहता। कई बार दूसरों के साथ कदम मिलाकर न चल पाने के कारण या फिर समाज के रंग-ढंग, लोगों का व्यवहार देखकर मनुष्य स्वयं अकेले चलने के लिए विवश हो जाता है।

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अकेलापन अपने आप में बहुत ही कष्टकारी स्थिति का परिचायक है। मनुष्य अनजाने में ही अपने लिए अकेलेपन को आमन्त्रित कर लेता है। अकेलापन हमारा स्वयं का व्यवहार जाले की तरह बुन देता है और फिर मकड़े की तरह व्यक्ति उसमें जकड़ा रहता है। मनुष्य उससे बाहर निकलने के लिए भरसक प्रयास करता है, हाथ-पैर पटकता रहता है, पर उसमें सफल नहीं हो पाता।

विचारों के उर्वरकों और समय के जल से सम्बन्ध रूपी पौधों की सिंचाई करनी पड़ती है। तभी मनुष्य के सम्बन्ध लम्बे समय तक चलते हैं। जिस प्रकार कुछ पौधे शीघ्र फलने-फूलने लगते हैं और कुछ सालों के उपरान्त। उसी तरह कुछ बन्धु-बान्धव भी निश्चित समयावधि तक मनुष्य साथ चलते हैं और कुछ जीवन पर्यन्त साथ निभाते हैं। उनकी पहचान करनी आवश्यक होती है। नहीं तो उनके धोखा देने पर मन निराश होकर अकेलेपन की चादर ओढ़ लेता है।

पौधे हरे-भरे रहे सकें इसके लिए समय-समय पर पूरे मन से सिंचाई, निराई, गुड़ाई करनी होती है। यदि पौधे को सूर्य के प्रकाश में रखने के स्थान पर बन्द कमरे में ही रख देंगे तो बड़े वृक्ष न बनकर वे बोंजाई बन जाएंगे। ऐसे पौधे केवल सजावट के लिए होते हैं, उससे फल और फूल तो मिल सकते हैं, पर शीतल छाया नहीं मिल सकती। मनुष्य के सम्बन्ध मिलने-जुलने से या सम्पर्क बनाए रखने पर ही फलदायी होते हैं। 

यदि बन्धु-बान्धवों से दूरी बनाई जाए तो वे सम्बन्ध भी मुरझाने लगते हैं। वे केवल नाम के ही रह जाते हैं। उस समय मनुष्य की भी वही स्थिति होत्ती है, जो अपनों से कटकर अलग-थलग रहने लगता है। वह शीघ्र ही अपनों से दूर हो जाता है। तब स्वेच्छा से अपनाया गया उसका यह अकेलापन अन्ततः न उससे उगलते बनता है और न ही निगलते बनता है। वह अपने द्वारा चुने हुए अन्धेरों के मध्य कहीं खो जाता है।

प्रसन्नचित व्यक्तियों से बिना किसी स्वार्थ के मिलने पर मनुष्य का मन चहकता है, खुश होता है, प्रसन्न रहता है। ऐसा मनुष्य कभी एकाकी नहीं हो सकता। वह सदा चारों ओर खुशियाँ ही बाँटता है और अजनबियों का स्वागत खुले दिल से करता है। वह लोगों को उसी प्रकार मोह लेता है जैसे वृक्ष बादलों को आकर्षित करके वर्षा करवा लेते हैं।

अन्त में इतना ही कहना चाहती हूँ कि दुर्भाग्य से मिले अकेलेपन को भी दूर करने का प्रयास करना चाहिए। समाज से कटकर नहीं रहना चाहिए। लोगों से इच्छा न होते हुए भी मिलते रहना चाहिए। परिस्थिति कैसी भी कयों न हो अपने लिए इस अकेलेपन का चुनाव करने का कठोर फैसला करने से पहले दस बार विचार अवश्य कर लेना चाहिए।

  • चन्द्र प्रभा सूद
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