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स्विच ऑफ (लघुकथा)

टन-टन की आवाज़ सुनते हुये सुबह के सात बजे निशा अपने गदराये शरीर को संभालती हुयी दरवाजे की ओर लपकी।अभी दरवाजा खोलने ही वाली थी कि बाहर  एक बुढ़िया जोकि पड़ोसिन से बातें कर रही थी ,उसकी जानी पहचानी आवाज़ सुनकर वह दबे पाँव धीरे से वापिस आकर घंटी का स्विच ऑफ करके बुदबुदाती हुई कहती है ,”यह बुढ़िया तो वही है,जो हर साल त्योहार पर माँगने आती है ,और हर बार मैं इसको दान भी देती हूँ।परन्तु कितनी बार इसे कहा है कि छुट्टी वाले दिन सुबह-सुबह माँगने मत आया कर!कुछ चाहिये तो शाम को आया कर।
पर यह सुनती नहीं।
खैर,आज तो इस को मैं कुछ नहीं दूँगी। निशा बिस्तर पर ढेर होते हुये बाहर दरवाजे पर दोबारा  होने वाली आहट की प्रतीक्षा करती है ।जब कोई आवाज़ नहीं आती तो वह धीरे से उठकर दरवाजे पर कान रखते हुये बुढ़िया का दर्द भरा स्वर सुनती है ,”मैं ही पागल हूँ,नासमझ हूँ,सोचा था ,आज चाय-नाश्ता मिल जायेगा मुझे दान में !और मैं
हमेशा बिन बुलाये मेहमान की तरह टपक पड़ी सुबह-सुबह ,वह भी बिना सोचे समझे!! मैं यह कैसे भूल गई
कि बड़े लोगों का दिन 10.00 बजे शुरु होता है।निशा बुढ़िया को भीतर से ही रोकने हेतु जब आवाज़ लगाती है तब बुढ़िया चलते-चलते कहती है ,बिटिया ,दूधो नहाओ पूतो फलो!अब अगले वर्ष संध्या को ही माँगने आऊँगी।निशा घंटी का स्विच ऑफ से ऑन कर लेती है।
– डॉ.पूर्णिमा राय
  संपादक, नवयुग सन्देश
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