अस्थमा से रोज लगभग 1000 लोगों की होती है मौत, जानिए क्यों होती है ये बीमारी

अस्थमा रोग आम तौर पर एलर्जी से संबधित बीमारी है। वातावरण में धूल, धुएं आदि के कण सांस लेने के साथ ही सांस नली में पहुंच जाते हैं। इससे सांस लेने में दिक्कत आती है। जो धीरे-धीरे अस्थमा का रूप ले लेती है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर साल मई के पहले मंगलवार को “वर्ल्ड अस्थमा डे” मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अस्थमा से प्रभावित लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना है। साल 2019 के लिए “वर्ल्ड अस्थमा डे” का थीम “एलर्जी एंड अस्थमा” रखा गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर दिन 1000 लोगों की मौत अस्थमा के कारण हो जाती है। दुनियाभर में 339 मिलियन से अधिक लोग अस्थमा रोग से प्रभावित है। जिनमें से भारत में 20-30 मिलियन लोग अस्थमा से पीड़ित है।

डॉ सतीश कौल, एचओडी एंड डारेक्टर, इंटरनल मेडिसिन, नारायणा सुपर स्पेशेलिटी अस्पताल, गुरूग्राम बताते है, अस्थमा के मरीजों सांस की नली में सूजन आ जाता है, जिससे सांस की नली सिकुड़ जाती है, जिसके कारण उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगती है। भारत में लगातार अस्थमा के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है, यहां लगभग 20-30 मिलियन लोग अस्थमा से पीड़ित है। इससे बचने के लिए सबसे पहले यह पहचानना जरूरी है कि आप में दिखने वाले लक्षण दमा के है या नही। क्योंकि हर बार सांस फूलना अस्थमा नही होता है, लेकिन अगर किसी को अस्थमा है तो उसकी सांस जरूर फूलती है। अस्थमा के रोगियों में सांस फूलना, सांस लेते समय सीटी की आवाज आना, लम्बें समय तक खांसी आना, सीने में दर्द की शिकायत होना और सीने में जकड़न होना आदि लक्षण दिखाई देते है। इस रोग की सही पहचान के लिए पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट अनिवार्य है।

क्यों होता है अस्थमा
सभी आयु वर्ग के लोग अस्थमा की बीमारी के शिकार हो रहे है। जिसका मुख्य कारण खराब दिनचर्या, खान-पान का ठीक ना होना और अस्थमा के प्रति जागरूकता की कमी है। भारत में 20 प्रतिशत ऐसे मरीज है, जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है।

अस्थमा से पीड़ित लोग ठीक से सांस नही ले पाता या मुंह से सांस लेता है। अस्थमा से पीड़ित मरीजों के सांस की नलियों में सूजन हो जाता है, जिससे नलियां सिकुड़ जाती है और मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है। इसके साथ ही प्रदुषण, तापमान में एकाएक बदलाव, एलर्जी, स्मोकिंग, धूल और धुएं के ज्यादा सम्पर्क में रहने से अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। यह बीमारी घर में धूल या पालतू जानवरों से एलर्जी होने के कारण भी बढ़ रही है। अस्थमा के रोगियों में हर बार सांस फूलना ही दमा नहीं होता लेकिन अगर किसी को दमा रोग है तो उसकी सांस जरूर फूलती है।

प्रदूषण-
आजकल देश में बढ़ता प्रदूषण भी अस्थमा होने के मुख्य कारणों में शामिल है। प्रदूषण के कारण दूषित हवा जब हमारे फेफड़ों में पहुंचती है तो इससे सांस लेने में परेशनी होने लगती है। इससे बचने के लिए बाहर निकलते समय अच्छी गुणवत्ता वाले मास्क का प्रयोग करे अपने मुंह को ढ़ककर रखें।

वायरल इंफेक्शन-
यदि आप बार-बार सर्दी, बुखार से परेशान है, तो यह एलर्जी का संकेत हो सकता है। अस्थमा की शुरूआत वायरल इंफेक्शन से ही होती है। इससे बचने के लिए संतुलित जीवनशैली अपनाएं और सही समय पर डॉक्टर से इलाज कराएं।

अस्थमा के प्रकार
एलर्जिक अस्थमा-
यदि आपको धूल-मिट्टी के संम्पर्क में आने से सांस लेने में किसी प्रकार की तकलीप महसूस होती है तो उसे एलर्जिक अस्थमा कहते है।

नॉनएलर्जिक अस्थमा-
जब आप बहुत अधिक तनाव में हो और आपको अचानक सर्दी लगने लगें या खांसी-जुकाम हो जाए, यह नॉनएलर्जिक अस्थमा के कारण होता है।

एक्सरसाइज इनड्यूस अस्थमा-
कई लोग अधिक एक्सरसाइज और शारीरिक गतिविधि के कारण भी अस्थमा के शिकार हो जाते है।

ऑक्यूपेशनल अस्थमा-
इस प्रकार के अस्थमा के अटैक अचानक काम के दौरान पड़ता है। नियमित रूप से लगातार आप एक ही तरह के काम करते है तो अक्सर आपको इस दौरान अटैक पड़ने लगते है, इसे ऑक्यूपेशनल अस्थमा कहते है।

चाइल्ड ऑनसेट अस्थमा-
इस प्रकार का अस्थमा सिर्फ बच्चों को ही होता है। अस्थमैटिक बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, इस प्रकार के अस्थमा से अपने आप ही बाहर आने लगता है। यह अस्थमा गंभीर नहीं होता और उचित समय पर इलाज कराकर बच्चे को इससे बचाया जा सकता है।

वयस्क उम्र में अस्थमा की चपेट में आने वाले लोगों और गैर-एलर्जी अस्थमा पीड़ितों में मोटापे का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। छोटे बच्चों में डर और स्ट्रेस का बढ़ता स्तर उन्हें अस्थमा की ओर ले जाता है। स्ट्रेस की वजह से हार्मोन में गड़बड़ी हो जाती है, जिसकी वजह से मनुष्य के फेफड़े व श्वास तंत्र की नाड़ियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे उन्हें सांस लेने में दिक्कतें होती है।

अस्थमा के लक्षण
छाती में तनाव होना
सांस फूलना
सांस से सीटी जैसी आवाज आना
सीने में जकड़न
बार-बार जुकाम होना
लम्बे समय से खांसी आना
सीने में दर्द की शिकायत होना
थकान महसूस होना
होंठ नीले पड़ना
नाखूनों का पीला पड़ना

अस्थमा का इलाज
वैसे तो अस्थमा का कोई इलाज नही है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है। किसी प्रकार के लक्षण महसूस होने पर तुरन्त सम्पर्क करें। अस्थमा को नियंत्रित करने में दवा का नियमित सेवन जरूरी है। इसके अलावा इंहेलर थेरेपी सही ढंग से लेना भी जरूरी है। अस्थमा के लिए इंहेलर्स सबसे अच्छी दवा है। इंहेलर्स से दवा सीधे फेफड़ों में पहुंचती है, जिससे पीड़ित को आराम महसूस होता है। यह सीरप के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद है। इससे बीमारी को नियंत्रित करने और पीड़ित को अटैक से बचाने तथा उसके फेफड़ों को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है। इनहेल्ड दवाओं के प्रति कम स्वीकृति के कारण दमा के मरीजों का इलाज ओरल टेबलेट और
इंजेक्शन से भी किया जाता है।

इसके साथ ही पीकलो मीटर जैसे सरल उपकरण अस्थमा का पता लगाने तथा इस पर निगरानी रखने के लिये उपलब्ध हैं। अधिकांश लोग बार-बार होने वाली कफिंग, सांस लेने में तकलीफ और छींक आने जैसे लक्षणों का उपचार स्वंय ही करने लगते है

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