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पग स्पर्श से तारी थी श्री राम ने अहिल्या

तड़का वध के पश्चात विश्वामित्र राम, लक्षमण को  एक सुन्दर तपोवन सिद्धाश्रम में ले गए । (सिद्धाश्रम एक तपोभूमि है, जहां ऋषि वामन ने तप किया था)|

 

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विश्वामित्र ने उसी दिन यज्ञ आरम्भ कर दिया । वह कई दिनों तक लगातार चलता रहा, उस यज्ञ में  एक क्षण के लिए भी विश्राम लिए बिना दोनों राम, लक्षमण ने यग्य की रक्षा की। लगातार यज्ञ के चलने के बाद,  आकाश में सहसा गर्जन का घोर शब्द सुनाई पड़ा ।

 

दो भीषण भयंकर मुख वाले राक्षस वहां आ धमके ।  एक ताड़का-पुत्र “मारीच” था और दूसरा उसका साथी “सुबाहु” । उनके पीछे और भी बहुत-से राक्षस थे । सब रक्त-मांस आदि दूषित पदार्थ लेकर यज्ञ को हमेशा की तरह विध्वंस करने व दूषित करने आए थे ।

 

तत्काल मारीच और महाराक्षस सुबाहु को राम ने आग्नेयास्त्र से मार गिराया । इसके बाद उन्होंने सारी राक्षस मण्डली को नष्ट कर डाला ।

इस प्रकार राम व लक्षमण ने समस्त क्षेत्र को राक्षस विहीन कर दिया|

 

विश्वामित्र ने दोनों राजकुमारों से  मिथिला के यशस्वी राजा जनक के विराट यज्ञ के आयोजन का समाचार सुनाया । व राजा जनक के विचित्र धनुष की प्रतिज्ञा भी बताई। जिस पर आज तक कोई भी वीर प्रत्यञ्चा नहीं चढ़ा सका है ।

 

सभी ने मिथिला के लिए प्रस्थान किया । मार्ग से  नगर के बाहर सूना-सा आश्रम दिखाई पड़ा । राम ने कौतूहलवश विश्वामित्र से उसका इतिहास पूछा ।

 

 

विश्वामित्र बोले–राम ! किसी समय महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ इसी आश्रम में रहते थे । इन्द्र बहुत दिनों से अहल्या पर मोहित था । एक दिन गौतम बाहर गए हुए थे । तडके ही इन्द्र कपट पूर्वक  आश्रम में आया और अहल्या की सात्विकता को  भंग कर दिया

 

उसी समय महर्षि गौतम आ पहुंचे । उसका रंग-ढंग देखकर वे सब-कुछ समझ गए । उन्होंने उसी क्षण अहल्या को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया ।

राम ने आगे बढ़कर ऋषि-पत्नी के पैर छुए । अहिल्या श्री राम का स्पर्श पाते ही नारी में परिवर्तित हो गई| और श्राप से मुक्त हो गई|

|| रामचंद्र भगवान की जय ||

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