घर और पत्नी के प्रति इस तरह बनें ज़िम्मेदार, निभाएं यह भूमिका

जिंदगी के कुछ मरहले ऐसे है जिनसे हर इंसान को गुजरना पड़ता है । अगर आप एक शादीशुदा जीवन व्यतीत कर रहे है तो जाहिर है आप या तो बाप बन चुके होंगे या बनने वाले होंगे लेकिन क्या आप जानते है कि बाप बनना कितनी जिम्मेदारी भरा काम होता है। एक पति के रूप में उसका स्थान कहीं और होता है और एक बाप के रूप में कहीं लेकिन आपकी जिंदगी भर एक मरहला और एक लम्हा ऐसा भी आता है जब आप दोनों कि जिंदगी की दुआएं कर रहे होते है और वो मरहला या वो लम्हा डिलीवरी के दौरान का होता है । तो आइये जानते है कि एक बाप के रूप में आप इस बड़ी जिम्मेदारी का किस तरह सही रूप में निर्वाहन कर सकते है ।

एक पति के रूप में आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप अपनी पत्नी की सेहत और उसकी जरूरतों का पूरा ख्याल रखें और ये जिम्मेदारी उसके गर्भवती होने के साथ ही और भी बढ़ जाती है । गर्भ की अवस्था में एक स्त्री का वजन आम महिला के वजन से 9 से 11 किलो तक बढ़ जाता है । पहली तिमाही के बाद महिला का वजन 2 किलो प्रति माह या यूँ कह लें 0.5 प्रति सप्ताह बढ़ना चाहिये । इस दौरान वजन बढाने में कैलोरी की मात्रा बड़ी ही निर्णायक साबित होती है लेकिन अगर एक स्त्री का वजन हर महीने 2 किलोग्राम से कम बढ़ रहा है तो ये सही नहीं है क्योंकि वजन न बढ़ने से गर्भाशय में गड़बड़ी होने का अंदेशा रहता है इसलिए ऐसा होने पर आप अपनी बीवी को जांच के लिए जरूर भेजें ।

शायद आपमें से बहुत से लोग न जानते हो लेकिन सच तो ये है कि डिलीवरी के दौरान हाइट भी एक बड़ा किरदार अदा करती है । अक्सर देखा गया है कि कुछ हद तक क़म हाइट वाली स्त्रियों की श्रोणि छोटी होने के कारण खतरे का जोखिम बढ़ जाता है । आमतौर पर ऐसी महिलाएं जिनकी हाइट 145 सेंटी मीटर से कम होती है उनमें प्रसव के समय असामान्यता या किसी गड़बड़ी होने की संभावना अधिक रहती है । ये अति संवेदनशील महिलाएं समझी जाती हैं इसी लिए इसकी डीलीवरी के लिए अस्पताल को ही सुरक्षित समझा जाता है ।

प्रसव में हर चीज की तरह ब्लडप्रेशर का भी अपना एक महत्त्व है और डिलीवरी से पहले इसकी जांच अत्यंत आवश्यक है । यदि ऐसी अवस्था में स्त्री का ब्लडप्रेशर हाई हो (140-90 से अधिक अथवा 90 एमएम से अधिक डायलेटेशन) और उसके मूत्र में अल्बूमिन की मात्रा पाई जाए तो महिला को प्रीएक्लेम्पसिया के दायरे में मान लेना चाहिए और अगर डायास्टोलिक की मात्रा 110 एम एम एच जी से भी अधिक हो जाये तो इसे किसी गम्भीर बिमारी की निशानी समझ सीएचसी या एफआरयू में रिफर कर दिया जाना चाहिए अन्यथा इसके घातक परिणाम सामने आ सकते है।