अपना जीवन बहुत ही सरल एवं सुलझे हुए सिद्धान्तों पर जीने वाले लोगों में से थें राजीव दीक्षित, जन्म दिन व पुण्यतिथि आज

आज राजीव दीक्षित का जन्म दिन व पुण्यतिथि है। स्वदेशी का समर्थन करने वाले सभी लोग आज स्वदेशी दिवस मना रहे हैं।

स्वदेशी प्रचलन को भारत में कायम करने के लिए अपनी एड़ी चोटी एक करने वाले शख्स राजीव दीक्षित की कहानी बहुत ही दिलचस्प है। राजीव दीक्षित अपना जीवन बहुत ही सरल एवं सुलझे हुए सिद्धान्तों पर जीने वाले में से थें। लेकिन इतने सुलझे व्यक्ति की मौत के रहस्य को आज तक कोई सुलझा नही पाया है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद ,जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में राधेश्याम दीक्षित एवं मिथिलेश कुमारी के यहाँ 30 नवम्बर 1967 को पैदा हुए राजीव की शिक्षा दीक्षा 12 वीं तक की पढ़ाई फिरोजाबाद में हुई। राजीव दीक्षित के परिवार में उनके छोटे भाई प्रदीप दीक्षित और बहन लता शर्मा है। राजीव दीक्षित ने अपना बचपन गाँव नाह में ही बिताया था। जहाँ से उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ली थी। उन्होंने अपने एक व्याख्यान में अपने गाँव के बारे में बताया था कि उनके गाँव में अभी तक बिजली और रोड नहीं है जिसके कारण उन्हें गाँव से पाँच से छह कि.मी.पहले ही उतरकर गाँव में पैदल जाना पड़ता था |
  • Rajiv Dixit (राजीव दीक्षित) ने B.tech और M.Tech की थी।
  • पढाई के दौरान एक रिसर्च के सिलसिले में वो नीदरलैंड गये जहा पर एम्स्टर्डम में उनको अपने रिसर्च के बारे में बोलना था। यहा पर जब उन्होंने अंगरेजी में अपना रिसर्च पत्र पढना शुरू किया तो उनको एक डच वैज्ञानिक ने रोकते हुए कहा कि “तुम अपनी मातृभाषा हिंदी में रिसर्च पेपर क्यों नही पढ़ते ? ” इस पर Rajiv Dixit राजीव दीक्षित ने जवाब दिया “अगर मै हिंदी में रिसर्च पेपर पढूंगा तो यहा पर किसी को समझ में नही आएगा ” । उस डच वैज्ञानिक ने कहा “हमारी समझने या ना समझने की चिंता आप क्यों करते है और आप से पहले आये हुए कई वैज्ञानिको ने अपनी मातृभाषा में रिसर्च पेपर पढ़ा था जबकि वो भी चाहते तो अंग्रेजी में पढ़ सकते थे , इसके अलावा यहा पर भाषा अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है जिससे आपकी बात लोगो तक पहुच जायेगी ”।

    इसके बाद से Rajiv Dixit राजीव दीक्षित को अपनी मातृभाषा के महत्व की समझ आयी कि जब तक आप अपने मौलिक शोध के बारे में अपनी मातृभाषा में नही बोलेंगे तब तक आपको कोई नही समझ पायेगा। इसके बाद उन्होंने गहन चिन्तन किया और हिंदी पर अपनी पकड़ बनाना शुरू किया क्योंकि बचपन से अंग्रेजी विध्यालयो में पढने की वजह से उनकी आदत अंग्रेजी भाषा की बनी हुयी थी। वही पर उन्होंने अन्य देश के एक वैज्ञानिको से उनकी शिक्षा पद्दति के बारे में प्रश्न किया तो उन्होंने बताया कि उनकी शिक्षा पद्धति उनकी मातृभाषा में होती है। तब राजीव दीक्षित ने सोचा कि अगर दुसरे सभे देश अपनी मातृभाषा में उच्च शिक्षा लेते है तो भारत में शिक्षा पद्दति का अंग्रेजीकरण क्यों है और इसका निदान कैसे किया जाए। इसके बाद वो भारत की शिक्षा पद्धति की खोज में लग गये।

    बाबा रामदेव से मुलाकात:

    बदलाव का दौर तो तब शुरू हुआ जब 1999 में बाबा रामदेव ने राजीव दीक्षित की समाज में उभरती हुयी छवि को पहचाना। बाबा रामदेव भी स्वदेशी परम्परा को देश में कायम करने के लिए आंदोलन करते थे साथ ही उनके कई ट्रस्ट और अन्य कई तरह की संस्थाएं भी इस काम के लिए अग्रणी रहती थीं। राजीव दीक्षित और बाबा रामदेव का लक्ष्य एक ही था, इसलिए बाबा रामदेव ने राजीव दीक्षित को अपनी स्वदेशी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया,और बाद में दोनों लोगों ने मिलकर पुरे दस साल तक भारत में अपने अथक प्रयासों से देश में आयुर्वेद का ज्ञान फैलाया। दस वर्षो के बाद दोनों ने मिलकर 2009 में “भारत स्वाभिमान ” की स्थापना की थी | इस “भारत स्वाभिमान ” के राष्ट्रीय सचिव का पद राजीव दीक्षित को दिया गया | बाबा रामदेव भी राजीव जी के व्याख्यानों से इतने प्प्रेरित थे कि उन्होंने कई व्याख्यान अपने पातंजली योगपीठ में करवाए ताकि उनकी बात टीवी के माध्यम से पुरे देश की जनता तक पहुचे |

    1 अप्रैल 2009 को भारत स्वाभिमान का उद्घाटन हुआ था जिसे आस्था टीवी चैनल पर सीधा प्रसारित किया गया था | यही से उनकी लोकप्रियता चरम सीमा पर पहुच गयी थी और देश के करोड़ो लोग उनके व्याख्यान सुनने लगे | उनके व्याख्यान इतनी सरल भाषा में होते थे जिनको समझना बड़ा आसान था | उनके व्याख्यानों से देश के लोगो को भारत का वास्तविक इतिहास और स्वदेशी की महता का पता चला था | उन्होंने इस भारत स्वाभिमान के तहत कई विदेशी कंपनियों का खुलासा किया था जो भारत को अनेक वर्षो से लुट रही है | उनको राजीनीतिक पार्टियों से भी आपत्ति थी और उन पर खुलकर प्रहार करते थे | इसी के साथ उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति , देश के सविधान ,कानून प्रणाली जैसे कई मुद्दों पर तथ्यों के साथ अपने व्याख्यान दिए थे |

    भारत में स्वदेशी का विस्तार:

    पिछले 20 वर्षों में राजीव दीक्षित ने भारतीय इतिहास से जो कुछ सीखा उसके बारे में लोगों को बहुत जाग्रत किया | अंग्रेज भारत क्यों आये थे, उन्होंने हमें गुलाम क्यों बनाया, अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता, हमारी शिक्षा और उद्योगों को क्यों नष्ट किया, और किस तरह नष्ट किया| इस पर विस्तार से जानकारी दी ताकि भारत फिर से गुलाम ना बन सकें | इन बीस वर्षों में राजीव  ने लगभग 12000 से अधिक व्याख्यान दिए जिनमें कुछ हमारे पास उपलब्ध हैं| आज भारत में लगभग 5000 से अधिक विदेशी कंपनियां व्यापार करके हमें लूट रही हैं|

    • उनके खिलाफ स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत की | देश में सबसे पहली विस्तृत स्वदेशी-विदेशी वस्तुओं की सूची तैयार करके स्वदेशी अपनाने का आग्रह प्रस्तुत किया|
    • 1991 में डंकल प्रस्तावों के खिलाफ घूम घूम कर जन जाग्रति की और रेलियाँ निकाली |
    • कोका कोला और पेप्सी जैसे पेयों के खिलाफ अभियान चलाया और कानूनी कार्यवाही की |
    • 1991-92 में राजस्थान के अलवर जिले में केडिया कंपनी के शराब कारखानों को बंद करवाने में भूमिका निभाई|
    • 1995-96 में टिहरी बाँध के खिलाफ भी राजीव दीक्षित ने ऐतिहासिक मोर्चा और संघर्ष किया जहाँ भयंकर लाठीचार्ज में उन्हें काफी चोटें आई |

    आंदोलन:

    राजीव दीक्षित आयुर्वेद ,जैविक खेती ,होमियोपैथी ,कानून और इतिहास के बहुत ही अच्छे जानकर थें ,शुरू से ही उन्हें विदेशी कम्पनियों तथा विदेश रहन सहन से तकलीफ होती थी। इसलिए उन्होंने देश में कई ऐसे आंदोलन भी किये जिसमे उन्होंने विदेशी सामानों के बहिस्कार करने की बात कही है। साथ ही वह स्वदेशी परम्परा को कायम रखने पर भी जोड़ देते रहें।

    •  राजीव दीक्षित ने स्वर्देशी जनरल स्टोर की एक श्रृंखला खोलने के आंदोलन का समर्थन किया, जहां केवल भारत द्वारा बनाये गए सामान बिकते थें।
    • वह स्वदेशी में विश्वास करते थे उन्होंने स्वदेशी आंदोलन और आजादी बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलनों की शुरुआत की और उनके प्रवक्ता बने। उन्होंने नई दिल्ली में स्वदेशी जागरण मंच के नेतृत्व में 70,000 से अधिक लोगों की रैली को संबोधित कि

    राजीव दीक्षित की उपलब्धियां-

    • राजीव दीक्षित ने कई पुस्तकें लिखी और कई लेक्चर भी दिए जिनका संग्रह सीडी, एसडी कार्ड्स इत्यादि जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न ट्रस्टों के द्वारा प्रकाशित कराया गया है
    • ऑडियो रूप में उनकी 1999 में भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय अतीत की महनता पर ऑडियो कैसेट बनी थी इसके अलावा ऑडियो में उनकी स्वास्थ्य कथा भी है
    • पुस्तकों में उनके द्वारा रचित है- स्वदेशी चिकित्सा, गौ गौवंश पर आधारित स्वदेशी कृषि, गौ माता, पंचगव्य चिकित्सा. ये सभी उनकी उपलब्धियों में शामिल है

    राजीव दीक्षित की मौत एक रहश्य –

    पुरे भारत में अपनी पहचान बनाने वाले व्यक्तित्व की मौत इस तरीके से होगी इस बात का अंदाजा किसी ने नहीं लगाया था। जी हाँ, राजीव दीक्षित की मौत एक गुमनाम मौत की ऐसी दास्ताँन है जिसे आज तक नहीं सुलझाया जा सका।

    दरअसल, राजीव दीक्षित की मौत 30 नवंबर 2010 में छत्तीसगढ़ में हुयी थी। उनकी मौत आज भी एक रहश्य है जो कभी खुला ही नहीं क्यूंकि इसे किसी ने खुलने ही नहीं दिया। राजीव दीक्षित अंग्रेजी दवाईयों का परहेज कटे एवं आयुर्वेद और होमेओपेथी उपचार पर भरोसा करते थें। 29 नवंबर को राजीव दीक्षित की अचानक तबियत ख़राब हो जाती है,चुकी उन्हें अंग्रेजी दवाईयों से परहेज था और वह इसके खिलाफ थें इसलिए उन्होंने अस्पताल जाने से मना कर दिया और पास के ही आयुर्वेदिक आश्रम में ठहर जाते हैं और वहां रुकने के बाद वह बाथरूम जाते हैं,बाथरूम से जब बहुत देर तक बाहर हैं तो लोगों को चिंता होने लगती है ,और फिर दरवाजा तोड़ा जाता है जहाँ देखा जाता है की राजीव दीक्षित बेहोश पड़े हैं।

    उन्हें उठाकर भिलाई के अपोलो स्पताल में ले जाया जाता है।,जब उन्हें होश आता है तो उन्हें यह बताया गया की  तबियत ख़राब होने की वजह से उन्हें यहाँ लाया गया। इस बात पर राजीव दीक्षित कहते हैं की मैंने शुरू से अंग्रेजी हुकूमत और अंग्रेजी दवाईयों आदि का बहिस्कार किया है यह सही नहीं है लेकिन उनके अनुयायिओं ने उनकी बात नहीं मानी और अपोलो हॉस्पिटल में उनका इलाज करवाया। लेकिन वहां भी उनकी तबियत में सुधार नहीं होता जिस कारण उन्हें दिल्ली ले जाने की तैयारी की जाती है। लेकिन इसी बीच आधी रात को डॉक्टर्स ने कह दिया की उनकी मौत हो गयी है। कारन पूछने हार्ट अटैक हवाला देते हैं डॉक्टर्स। क्योंकि उन्हें एसिडिटी की समस्या थी इस कारन अनुमान लगा कर डॉक्टर्स ने उनकी मौत का कारण हार्ट अटक बता दिया।

    हालाँकि बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती उनकी मौत के बाद कोई पोस्टमार्टम नहीं किया गया जिससे उनकी मौत का पुख्ता कारण पता चल सके। वहां से उनके भाई और बाकि लोगों द्वारा उनके पार्थिव शरीर को हरिद्वार में बाबा रामदेव के आश्रम पतंजलि योगपीठ ले जाया गया,जबकि उनका घर अलीगढ उत्तर प्रदेश में है। अंतिम समय में उन्हें देखने आये लोगों ने ध्यान दिया की उनका शरीर काला ,नीला पड़ गया था उनके होंठ नील हो गए थें। और चूँकि इनके विरोध एवं आंदोलन करने की वजह से प्रशाशन और सरकार में भी इनके बहुत से दुश्मन थें जिस वजह से लोगों का सोंचना भी सही था की कहीं ये मौत नहीं कोई मर्डर है। क्योंकि जो इंसान देशभर में लोगों को रोगमुक्त करने के प्रयास में काम करता था उसे कैसे कोई अचानक से बीमारी हो जाएगी और वह ऐसे मर जायेगा। इसलिए कुछ लोगों ने पोस्टमार्टम के लिए बोला लेकिन इस बात पर कोई हलचल नहीं हुई और किसी ने पोस्टमार्टम नहीं करवाया।

    बहुत से लोगों को बाबा रामदेव पर भी शक था की राजीव दीक्षित की हत्या उन्होंने ही करवाया है। इस तरह की कई बातें सामने आती रही, लेकिन कोई सबूत नहीं होने के कारण बस शक और आरोपों के बुनियाद पर राजीव दीक्षित के किस्से को खत्म कर दिया गया।