BJP नहीं दोहराना चाहती 2019 जैसी गलती! जानें उद्धव सरकार पर संकट के बाद भी क्यों कर रही इंतजार?

Maharashtra Political Crisis: महाराष्ट्र की सियासत में अब नया भूचाल आ गया है. तीन दलों के सहयोग से चल रही महा विकास आघाडी (MVA) सरकार पर अब संकट के बादल छाए हुए हैं. शिवसेना नेता एकनाथ शिंद के बगावत के बाद उद्धव ठाकरे को सत्ता गंवाने का डर सता रहा है. लेकिन इन सब के बीच बीजेपी चुपचाप बैठकर आगे की रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी इस बार 2019 जैसी गलती नहीं दोहराना चाहती, जब कुछ ही घंटे मुख्यमंत्री रहने के बाद देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा था. इस बार बीजेपी इंतजार कर रही है और सही वक्त पर सही कदम उठाने को तैयार है.

जल्दबाजी में भारी पड़ा था फैसला

एकनाथ शिंदे के संपर्क में 22 शिवसेना विधायक होने का दावा किया जा रहा है, साथ में सरकार का साथ देने वाले 4 अन्य विधायकों को भी शिंदे अपने साथ ले गए हैं. ऐसे में बीजेपी जानती है कि शिंदे के समर्थन वाले सभी विधायक भी अगर उनकी पार्टी को समर्थन दे दें तब भी सूबे में सरकार बनना मुश्किल है. बीजेपी ने ऐसी जल्दबाजी नवंबर 2019 में की थी जब अजित पवार ने बीजेपी को कागज पर समर्थन तो दिया था लेकिन वह विधायक जुटाने में नाकाम साबित हुए. इसके बाद सुबह शपथ लेने वाले फडणवीस की सरकार चंद घंटों में गिर गई थी.

बीजेपी के इंतजार की वजह कुछ और नहीं बल्कि वह दल-बदल कानून है जिसमें किसी भी दल के दो तिहाई विधायक टूटने पर ही उन्हें कानूनी मान्यता मिल सकती है. ऐसा न होने पर बगावत करने वाले विधायकों की सदस्यता तक जा सकती है और फिर सरकार बनाने की सारी कोशिशें धरी रह जाएंगी. फिलहाल महाराष्ट्र में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 145 विधायकों की जरूरत है और सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के पास सिर्फ 106 विधायक हैं. अब उसे सरकार बनाने के लिए 39 और विधायकों की जरूरत पड़ेगी लेकिन शिंदे के पास सिर्फ 25-27 बागी विधायक हैं.

दल-बदल कानून बन रहा बाधा

दूसरी तरह अगर शिंदे बीजेपी के साथ जाकर सरकार बनाना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम 36 विधायकों को तोड़ना होगा. इसकी वजह दल-बदल कानून हैं क्योंकि शिवसेना के पास सदन में 54 विधायक हैं और उसका दो-तिहाई 36 होगा, तभी इन विधायकों को कानूनी मान्यता मिल सकती है. उधर, 44 विधायकों वाली कांग्रेस के भी 10 विधायक लापता बताएं जा रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस में फूट डालने के लिए कम से कम 29 विधायकों को तोड़ना जरूरी है. ये दोनों ही स्थितियां फिलहाल दूर हैं और बीजेपी के पास अभी इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

बीजेपी जानती है कि शिवसेना और कांग्रेस के बागी विधायकों की मदद से सूबे में सरकार तो बन जाएगी लेकिन उसका टिक पाना बहुत मुश्किल है. आंकड़ों के मुताबिक 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी 106 विधायकों से साथ सबसे बड़ी पार्टी है. इसके बाद शिवसेना 55, एनसीपी 52 और कांग्रेस 44 विधायक रखती है. सदन में अन्य और निर्दलीय का आंकड़ा मिलाकर 30 के आस-पास है.

एकनाथ शिंदे का समर्थन काफी नहीं

एकनाथ शिंदे की बगावत से पहले उद्धव सरकार के पास कुल मिलाकर 169 विधायकों का समर्थन प्राप्त था। इसमें शिवसेना के पास 55, एनसीपी के पास 52 और कांग्रेस के 44 विधायक हैं। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के 2, पीजपी के 2, बीवीए के 3 और 9 निर्दलीय विधायकों का समर्थन था। फिलहाल 21 से ज्यादा विधायक शिंदे का साथ सूरत में हैं, जिसमें निर्दलीय विधायक भी शामिल हैं। वहीं, AIMIM के दो, सीपीएम के 1 और एमएनएस का 1 विधायक शामिल है।

उद्धव सरकार को बगावत से पहले करीब 170 विधायकों का समर्थन हासिल था. इनमें तीन बड़े दलों के अलावा सपा के 2, बीवीए के 3 और पीजपी के 2 विधायक भी शामिल थे. इसके अलावा कई निर्दलीय भी सरकार के साथ हैं. उधर शिंद के साथ बगावत करने वालों में 22 के करीब विधायक हैं जिनमें शिवसेना के अलावा सीपीएम, मनसे और AIMIM के विधायक भी बताए जा रहे हैं.

सरकार बनाने के लिए 145 विधायकों की जरूरत होगी. लेकिन बीजेपी के पास फिलहाल सिर्फ 113 का आंकड़ा मौजूद है. इसमें 106 बीजेपी विधायकों के अलावा आएरएसपी, निर्दलीय और जेएसएस के विधायक शामिल हैं. शिंद और बीजेपी के विधायकों को मिला भी दिया जाए तब भी यह आंकड़ा 130 के आस-पास ही पहुंच सकता है. ऐसे में बीजेपी अभी हालात को समझ रही है और रणनीति बनाकर कोई ठोस कदम उठाने की फिराक में है.