Breaking News
Home / देश / भारत में कोयले के विकल्‍पों की तरफ परिवर्तनकाल

भारत में कोयले के विकल्‍पों की तरफ परिवर्तनकाल

दुनिया भर में ऊर्जा की आवश्‍यकता के 28 प्रतिशत हिस्‍से की पूर्ति कोयले के माध्‍यम से उत्‍पादित बिजली से होती है। इससे विश्‍व में बनने वाली कुल बिजली के 41 प्रतिशत हिस्‍से का उत्‍पादन होता है और इससे वैश्विक स्‍तर पर निकलने वाली कुल कार्बन डाई ऑक्‍साइड का 46 प्रतिशत हिस्‍सा उत्‍सर्जित होता है।

इसके बरक्‍स, भारत में ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा कोयले के इर्द-गिर्द ही घूमता है। देश में उत्‍पादित होने वाली कुल बिजली का करीब 70 प्रतिशत हिस्‍सा कोयले से चलने वाले संयंत्रों से प्राप्‍त होता है। परिणामस्‍वरूप राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उत्‍सर्जित कार्बन डाई ऑक्‍साइड में इन संयंत्रों का योगदान 65 प्रतिशत है। भारत इस वक्‍त कोयले से बिजली उत्‍पादन के मामले में दुनिया में तीसरे स्‍थान पर है। वहीं, ऐसी बिजली का वह तीसरा सबसे बड़ा आयातक भी है।

हालांकि अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के हिसाब से भारत की आबादी का आधुनिक ऊर्जा के उपभोग के मामले में स्‍तर निम्‍न (880 किलोवाट प्रति घंटा/प्रतिव्‍यक्ति/प्रतिवर्ष) है। फिर भी, इस वक्‍त 8 प्रतिशत के हिसाब से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जीडीपी विकास दर रखने वाले देशों में शुमार किया जाने वाला भारत पेरिस समझौते के तहत प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी लाने के लक्ष्‍य को न सिर्फ पूरा करने बल्कि वर्ष 2005-2030 के दौरान ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन में 33-35 प्रतिशत कटौती करने के अपने संकल्‍प से भी ज्‍यादा कटौती करने के मार्ग पर अच्‍छी तरह आगे बढ़ (लक्ष्‍य का करीब 25 प्रतिशत वर्ष 2005-2014 के दौरान हासिल कर लिया गया) रहा है।

इसके अलावा वह वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्‍म ईंधन से बिजली उत्‍पादन करने क्षमता में 40 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी प्राप्‍त करने की दिशा में भी बढ़ रहा है (वर्ष 2017 तक करीब 30 प्रतिशत लक्ष्‍य प्राप्‍त किया जा चुका है)। हालांकि ऐसा अनुमान है कि भारत के ऊर्जा तंत्र में कम से कम 2030 तक कोयला ही बिजली उत्‍पादन का मुख्‍य आधार बना रहेगा।

कोयले से निर्भरता कम करके दूसरे विकल्‍पों की तरफ रुख करना, खासकर भारत जैसी कोयला आधारित अर्थव्‍यवस्‍था के लिये लघु से मध्‍यम काल में चुनौती भरा होगा। इस देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े सरोकारों और वर्ष 2022 तक बिजली की सार्वभौमिक पहुंच बनाने, आवासीय, स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी तथा शिक्षा से जुड़े राष्‍ट्रीय विकासात्‍मक लक्ष्‍यों (सतत विकास के लक्ष्‍यों के साथ) को देखते हुए यह रूपान्‍तरण बेहद कठिन है।

प्रोफेसर अमित गर्ग की अगुवाई वाली आईआईएम-अहमदाबाद की एक टीम ने छह सितम्‍बर को जारी हुई ‘कोल ट्रां‍जीशन इन इंडिया : असेसिंग इंडियाज एनर्जी ट्रांजीशन ऑप्‍शंस’ (लेखक- सरिता विश्‍वनाथन, अमित गर्ग एवं विनीत तिवारी) शीर्षक वाली अपनी सारांश रिपोर्ट में कोयले के भविष्‍य के बारे में कुछ प्रमुख अंतर्राष्‍ट्रीय तथा राष्‍ट्रीय बहस में उभरे बिंदुओं का उत्‍तर तलाशने की कोशिश की है। ऐसा फ्रांस के थिंक टैंक आईडीडीआरआई तथा ब्रिटेन के रिसर्च नेटवर्क क्‍लाइमेट स्‍ट्रैटेजीस द्वारा प्रकाशित ‘कोल ट्रांजीशंस : रिसर्च एण्‍ड डायलॉग ऑन द फ्यूचर ऑफ कोल’ प्रोजेक्‍ट के लिये किया गया।

यह रिपोर्ट भारत में कोयले के वर्ष 2050 तक के भविष्‍य को रेखांकित करती है। इसके उजागर किये गये तथ्‍यों में यह भी शामिल है कि दुनिया भर में प्रदूषणकारी तत्‍वों में कमी लाने के लक्ष्‍यों का भारत के ऊर्जा तंत्र पर गहरा असर पड़ेगा, वर्ष 2020 तक राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोयले का उपयोग 90 करोड़ के स्‍तर को छुएगा और यह स्थिति वर्ष 2030 तक बनी रहेगी, 25 साल से ज्‍यादा पुराने बिजली संयंत्रों को वर्ष 2040 तक बंद कर दिया जाएगा, कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों का पीएलएफ करीब 50 प्रतिशत के निम्‍न स्‍तर तक बना रहेगा लेकिन वर्ष 2030 तक गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों का पीएलएफ करीब 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा, वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा क्षमता 200 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। इसके अलावा वर्ष 2035 तक थर्मल पॉवर प्‍लांट्स के लिये कोयले का सालाना आयात 5 से 10 करोड़ टन और धातुकर्म के लिये 5 करोड़ टन तक जारी रह सकता है।

यहां यह भी गौर किया जाना चाहिये कि कोयले के इस्‍तेमाल से नहीं, बल्कि उससे निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्‍वों की वजह से चुनौतियां उत्‍पन्‍न होती हैं। उत्‍सर्जित होने वाले तत्‍वों को अलग करके कोयले का इस्‍तेमाल जारी रखा जा सकता है। भारत में कोयले के प्रयोग से होने वाले नकारात्‍मक प्रभावों को रोकने के लिये कोल गैसीफिकेशन, कोल बेड मीथेन और कोल माइन मीथेन जैसी प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता से अपनाया जाना चाहिये। ग्रीन हाउस गैसों के उन्‍नत शमन, कार्बन कैप्‍चर, उपयोग एवं भण्‍डारण, परमाणु ऊर्जा, स्‍मार्ट ग्रिड्स तथा बैटरी में भण्‍डारण को भी समानान्‍तर रूप से बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

प्रोफेसर गर्ग ने कहा “ऊर्जा तंत्र के रूपान्‍तरण के लिये वर्ष 2030 तक 6 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत पड़ेगी। ऊर्जा क्षेत्र को सबसे ज्‍यादा ऐसे निवेश यानी 2.4 ट्रिलियन डॉलर की आवश्‍यकता होगी। उसके बाद उद्योग (1.45 ट्रि‍लियन), परिवहन (1 ट्रिलियन), निर्माण (0.85 ट्रिलियन) तथा कृषि (0.32 ट्रिलियन) की बारी आती है।”

इस रिपोर्ट में राष्‍ट्रीय परिस्थितियों और जलवायु सम्‍बन्‍धी सामूहिक वैश्विक संकल्‍पों (एनडीसी, 2सी कन्‍वेंशनल, 2सी सस्‍टेनेबल) के विभिन्‍न स्‍तरों के अनुकूल रूपान्‍तरण के विस्‍तृत मार्ग सुझाये गये हैं। इसके अलावा यह रिपोर्ट भारत के ऊर्जा तंत्र में कोयले के भविष्‍य की महत्‍वपूर्ण अंदरूनी तस्‍वीर के साथ अंतर्राष्‍ट्रीय कोयला व्‍यापार पर इसके प्रभावों को सामने रखती है। इसके अलावा, यह रिपोर्ट भविष्‍य में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में रूपान्‍तरण के परिणामस्‍वरूप कोयला तथा ऊर्जा क्षेत्रों में फंसकर बेकार हो जाने वाली सम्‍पत्तियों के बारे में भी विमर्श प्रस्‍तुत करती है। इस रिपोर्ट में पानी जैसे प्रमुख प्राकृतिक संसाधन के कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर पड़ने वाले असर के बारे में भी चर्चा की गयी है।

कोयले को छोड़कर अन्‍य ऊर्जा उत्‍पादक स्रोतों पर तेजी से निर्भरता बढ़ी तो व्‍यर्थ हो जाने वाली सम्‍पत्तियां भी बढ़ेंगी, क्‍योंकि तब बिजली संयंत्रों को वक्‍त से पहले ही बंद करना पड़ेगा और उसके परिणामस्‍वरूप उसमें इस्‍तेमाल होने वाले कोयले का खनन भी नहीं होगा। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि उस स्थिति में भारतीय खदानों में करीब 22 अरब टन कोयला अनुपयोगी रह जाएगा, जिसका अनुमानित मूल्‍य लगभग 6.7 ट्रिलियन डॉलर है।

प्रोफेसर गर्ग ने कहा “इससे उन वित्‍तीय संस्‍थानों पर भी दबाव पड़ सकता है, जिन्‍होंने वर्ष 2006-2014 के दौरान विभिन्‍न कोयला आधारित बिजलीघरों की स्‍थापना के लिये कर्ज दे रखा है।”

इसके अलावा, प्राकृतिक (आपदाएं, जल संसाधन), मानव जनित (पानी की उपलब्‍धता, बिजली कारखानों से निकलने वाली राख का निस्‍तारण, स्‍थानीय वायु प्रदूषण, भू-अपघटन) एवं/अथवा नीति सम्‍बन्‍धी (राष्‍ट्रीय तथा अंतर्राष्‍ट्रीय बाजारों में ईंधन की कीमतें, बिजली सब्सिडी) रुकावटें ऊर्जा क्षेत्र पर प्रभाव डाल सकती हैं। अगर एक गीगावॉट की बिजली इकाई को एक दिन के लिये बंद किया जाए तो इससे करीब 6 से 15 लाख डॉलर तक के राजस्‍व का नुकसान होगा।

भारत में उपक्षेत्रीय स्‍तर पर सामाजिक, राजनीतिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्‍य में कोयले से इतर अन्‍य विकल्‍पों पर निर्भरता में वृद्धि से उपजी परिस्थितियों से निपटना भी बहुत चुनौतीपूर्ण है। भारत की कोयला खदानें प्रत्‍यक्ष रूप से सात लाख श्रमिकों और अप्रत्‍यक्ष रूप से 50 लाख लोगों को रोजगार उपलब्‍ध कराती हैं। इसके अलावा लगभग एक करोड़ लोग बिजली के निर्माण, उसकी आपूर्ति तथा सम्‍बन्धित अन्‍य कार्यों से जुड़े हैं।

प्रोफेसर गर्ग ने कहा “भारत में कोयले से इतर किसी अन्‍य ऊर्जा स्रोत पर निर्भरता बढ़ाने की दिशा में पहला कदम उठाने से पहले इससे जुड़े डेढ़ करोड़ से ज्‍यादा लोगों की श्रमशक्ति और उनके परिवार पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभावों के बारे में सोचना होगा।” इसीलिये कोयले को तिलांजलि देना भारत के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। आने वाले दशकों में अगर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी है तो इन सुधारात्‍मक कार्यों को करने से पहले कोयला तथा अन्‍य सम्‍बन्धित क्षेत्रों से जुड़े सभी पक्षों के नजरिये पर बेहद गम्‍भीरता से विचार करना होगा।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *