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नोटबंदी विशेष: देश ने किया था दिल खोलकर स्वागत, जानिए कैसा था वह मंजर

कालेधन पर जबरदस्त प्रहार करने वाले मोदी सरकार के 1000-500 के नोट बंद (नोटबंदी) के फैसले से पूरे देश पर असर पड़ा। एक आम इंसान से लेकर खास भी इससे परेशान और प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके उनके चेहरों पर चिंता की लकीरों के बल पड़ते दिखे। ऐसे में नोटबंदी से देश में किन-किन सेक्टरों और उद्योगों पर नोटबंदी का असर पड़ा, आइये नजर डालते हैं इस रिपोर्ट पर..

मुद्रीकरण (मुद्रा परिवर्तन, डिमोनीटाइजेशन) की गूंज भारत में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में सुनाई दी। एक ही रात में कई लोग अर्श से फर्श पर आ गए। लेकिन, सरकार के इस फैसले का आम जनता नेे दिल खोलकर स्वागत किया। कईयों ने तो इसे भारत के 70 साल के इतिहास का सबसे बड़ा फैसला बताया। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें यह फैसला रास नहीं आया और मोदी सरकार का जबरदस्त विरोध किया।

राजनीति हलको में भी मोदी सरकार को जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा। पूरे देश की सडक़ों से लगा राज्य एसेंबलियों और संसद तक विरोधियों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया और विरोध मार्च निकाले। लेकिन मोदी सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और नोटबंदी का पूरा समर्थन करती रही। मोदी सरकार में मंत्री, अफसर और नौकरशाह भी नोटबंदी को सही बताने में जुट गए। पूरा देश का ध्यान सिर्फ नोटबंदी पर था। हर तरफ नोटबंदी को लेकर चर्चाएं और प्रतिक्रियाएं आने लगीं। इन सबके बीच सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई देश के उद्योगपतियों ने जो नोटबंदी के फैसले का समर्थन करते रहे और इसके दूरगामी परिणाम के फायदे गिनाते रहे।

हालांकि, नोटबंदी का सीधा मामला देश की ग्रोथ और उद्योग जगत के नफा-नुकसान पर टिका था। क्योंकि नोटबंदी के तुरंत बाद पूरा देश बैंको के आगे नोट बदलवाने और निकासी में लगा हुआ था। अब ऐसे में बाजार ठप्प होना तो था ही। हर सेक्टर में बिक्री घटती गई। देश का पूरा ध्यान सिर्फ एक ही चीज पर था, नोटबंदी के बाद उत्पन्न समस्याओं को सुलझाना। छोटे और मंझोले व्यापारियों की फैक्ट्रियां बंद हुईं। पैसों की समस्या को लेकर फैक्ट्री और कारखाना मालिकों ने मजदूरों की छंटनी शुरू कर दी। हजारों की तादाद में लोग बेरोजगार हुए।

लेकिन नोटबंदी का एक चेहरा और देखने को मिला जिसका फायदा सीधे ऑटो सेक्टर और बुलियन मार्केट को मिला। नोटबंदी के बाद जमा कैश को ठिकाने लगाने के लिए लोगों ने नया रास्ता चुना। नोटबंदी के बाद पुराने नोटों को बैंकों में जमा कराने के लिए सरकार ने 60 दिनों का समय दिया था। लेकिन पूछताछ के डर से लोग कैश को बैंको में जमा कराने से कतराने लगे। लोगों ने इसके लिए नया रास्ता निकाला। धड़ल्ले से सोना और नई कारों की खरीददारी करनी शुरु कर दी। सर्राफा व्यापारियों ने माके का पूरा फायदा उठाकर पूरी-पूरी रात शोरुम खोलकर सोने की डबल भाव में जमकर सेल की। उस दौरान यह भी सुनने को मिला कि दिल्ली सर्राफा बाजार में तो लोग सोने की खरीदारी करने के लिए कारों में नोटों के कट्टे भरकर लाते देखे गए। हालांकि, इन बातों में कितनी सच्चाई है इसका दावा हम नहीं करते।

सोने के साथ ऑटो सेक्टर में भी रातों रात बूम आ गया। लोग पुराने नोटों के रुप में जमा कैश को लेकर कारों के शोरुमों पर पहुंचने लगे। रातों रात ऑटो सेक्टर में भी तेजी आ गई। लोग जमा कैश से कारों की खरीददारी करने लगे। ऑटो कंपनियों ने भी मौके को कैश करते हुए ग्राहकों को रेट लेस कर जमकर चांदी काटी। ऑटो कंपनियों ने पुराने नोटों को लेने में कोई गुरेज नहीं किया। पुराने नोटों के बल पर कंपनियों ने नोटबंदी में जमकर कारें बेचीं। इसको देखते हुए यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि नोटबंदी से ऑटो सेक्टर की कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा। नोटबंदी के बाद ऑटो कंपनियों के जारी क्वार्टरली आंकड़ों में सेल उल्टे 50 प्रतिशत तक बढक़र देखी गई।

ऐसे ही अगर हम सीमेंट कंपनियों की बात करें तो नोटबंदी के दौरान चल रहे कंस्ट्रक्शन ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ। क्योंकि ज्यादातर कंपनियों को एडवांस पैमेंट और चैक से काम करने का फायदा हुआ और बाजार में सीमेंट की डिमांड लगातार बनी रही। हालांकि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत की ज्यादातर कंपनियोंं के बिजनेस में ज्यादा ग्रोथ देखी गई।

लेकिन अगर नुकसान की बात करें तो रियल एस्टेट सेक्टर में बहुत मायूसी रही। मोदी सरकार की कालेधन के खिलाफ मुहिम में नोटबंदी का कदम बिल्डरों पर भारी पड़ा गया। नोटबंदी के पहले से ही रियल एस्टेट में काफी मंदी का दौर चल रहा था। लेकिन नोटबंदी ने तो जैसे बिल्डरों की कमर तोड़ दी। मोदी सरकार के कालेधन रखने वालों के खिलाफ कसते शिकंजे और ताबड़तोड़ आईटी रेड के चलते रियल एस्टेट में निवेशकों की संख्या घटने लगी।

हालांकि कई बार रियल एस्टेट में काले धन के इस्तेमाल की आवाजें उठीं। लेकिन इसको अपवाद छोड़ दें तो लोगों ने धन को सफेद करने के लिए नोटबंदी से पहले की बैकडेट में एग्रीमेंट भी बनवाए। लेकिन फिर भी इन्कम और सेल टैक्स जैसी एजेंसियों के पड़ते छापों से नोन टैकस पेयर लोगों ने अपना काला धन कई अलग तरीकों से ठिकाने लगाया।

अगर नोटबंदी के बाद एग्रीकल्चर इंडस्ट्री की करें तो उसका हाल सबसे बुरा हुआ। खासकर छोटे और खुदरा सब्जी व्यापारियों की हालत बिल्कुल पतली हो गई। आड़तियों ने नोटबंदी के बाद माल लेने से मना कर दिया। एक राज्य से दूसरे राज्यों में सब्जियों के ट्रांसपोर्ट पर भी रुकावट आ गई थी। नोटबंदी के बाद बंद हुए 1000-500 के नोट से ट्रांसपोटर्स ने पुराने नोट लेने से मना कर दिया। पूरे देश में ट्रकों और लोडिंग वालों का चक्का जाम हो गया। किसानों ने सीधे मंडी में आकर सब्जियों बेंची तो ग्राहक नहीं मिले। और आड़तियों से लगा किसानों का जीवन-यापन मुश्किल हो गया नफा-नुकसान का अंदाजा लगाना तो मुश्किल है।

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