फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भारत को आंशिक रूप से स्‍वतंत्र देश बताये जाने पर क्या कहना है सरकार का?

सरकार ने अमरीकी संगठन फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भारत के दर्जे को स्‍वतंत्र देश से घटाकर आंशिक रूप से स्‍वतंत्र देश किये जाने को भ्रामक, गलत और अनुचित बताया है। देश के संघीय ढांचे के तहत अनेक राज्‍यों में विपक्षी दलों की सरकारें होने का उदाहरण देते हुए सरकार ने कहा है कि यह भारत में जीवंत लोकतंत्र को दर्शाता है जिसके तहत केन्‍द्र से भिन्‍न विचारधारा वालों को भी महत्‍व दिये जाने का पता चलता है।

फ्रीडम हाउस रिपोर्ट का बिन्‍दुवार खंडन करते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कहा है कि देश में एक खास समुदाय के लोगों के साथ कथित भेदभाव की नीतियां अपनाए जाने का आरोप सरासर गलत है और सरकार सभी नागरिकों को संविधान में बताए गये समानता के अधिकार के तहत एकसमान मानती है। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि सरकार कायदे कानूनों पर अमल करते समय किसी से भेदभाव नहीं करती और सभी को समान माना जाता है। कानून और व्‍यवस्‍था लागू करते समय भी बिना किसी भेदभाव के एकसमान प्रक्रिया का पालन किया जाता है।

वर्ष 2019 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के बारे में सरकार ने कहा है कि कानून और व्‍यवस्‍था लागू करने वाली एजेंसियों ने शीघ्रता और पूरी निष्पक्षता से काम किया और स्थिति को काबू में करने के लिए उचित कार्रवाई की गयी। राजद्रोह कानून के दुरपयोग को लेकर, मंत्रालय ने कहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस प्रशासन राज्य के विषय हैं और कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों के पास है। इसलिए कानून लागू करने वाली एजेंसिया व्‍यवस्‍था बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाती हैं।

शिक्षाविदों और पत्रकारों को डराने-धमकाने और असहमति के स्‍वर को दबाने के आरोप के संबंध में सरकार ने कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली हुई है और चर्चा, बहस और असहमति भारतीय लोकतंत्र के अभिन्‍न अंग हैं। सरकार पत्रकारों सहित देश के सभी निवासियों की सुरक्षा और संरक्षा को सबसे अधिक महत्व देती है, और उसने मीडियाकर्मियों की सुरक्षा को लेकर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेष रूप से निर्देश जारी किये हैं। सरकार ने कहा है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कभी कभी इंटरनेट सहित दूरसंचार सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबन का सहारा लिया जाता है।

विदेशी मुद्रा विनियमन कानून–एफसीआरए में संशोधन करके एमनेस्टी इंटरनेशनल की संपत्तियों पर रोक लगाने के बारे में मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल को केवल एक बार एफसीआरए अधिनियम के तहत अनुमति मिली थी और वह भी 20 साल पहले। तब से, लगातार कई सरकारों ने इस संबंध में एमनेस्टी इंटरनेशनल के आवेदन को कभी मंजूरी नहीं दी है क्‍योंकि उसे पात्र नहीं पाया गया। लेकिन एमनेस्‍टी यू.के. ने एफसीआरए नियमों को दरकिनार करते हुए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के बहाने से भारत में पंजीकृत अपनी चार संस्थाओं को बड़ी मात्रा में धनराशि दी। गृह मंत्रालय की मंजूरी के बिना एमनेस्टी इंडिया को भी काफी बड़ी राशि दी गई।

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