राजस्थान में कई जिलों में गायों पर लंपी बीमारी का कहर

राजस्थान में सीमांत जैसलमेर सहित कई पश्चिमी जिलों में गायों में फैली लंपी स्किन बीमारी का कहर जारी है और दस हजार से अधिक गायें इसकी चपेट में आ चुकी हैं। राज्य सरकार एवं पशुपालन विभाग इसे लेकर सतर्क हैं और इस बीमारी पर काबू पाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। जिला कलेक्टर टीना डाबी ने बताया कि पशुपालन विभाग द्वारा जिले में पशुओं में फैली बीमारी के संबंध में लगातार सर्वे किया जा रहा हैं।

अब तक दो लाख से ज्यादा गायों का सर्वे किया जा चुका है। दस हजार से ज्यादा गाएं इस रोग से ग्रसित थी जिनमें करीब छह हजार गायें इस बीमारी से ठीक हो चुकी है। हालांकि पशुपालन विभाग में बड़ी तादात में पद रिक्त हैं, चिकित्सकों की कमी हैं और इस संबंध में राज्य सरकार को अवगत कराया गया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार विभाग द्वारा करीब पांच लाख गायों में से एक लाख 92 हजार 733 पशुओं का सर्वे किया गया। दस हजार से अधिक गायों में यह बीमारी पाई गई 5609 गायों का उपचार किया गया जिनमें 5441 गायें ठीक हो चुकी है जबकि 6559 गायें बीमारी से प्रभावित है। इस बीमारी से 183 गायों की मौत हो चुकी है। हालांकि पशुपालक एवं अन्य सूत्र गायों के मरने का आंकड़ा इससे ज्यादा बताया जा रहा है।

पशुपालन विभाग के बहूउद्देशीय पशु चिकित्सालय के उपनिदेशक डॉ. उमेश वारगंटीवार ने बताया कि पशु चिकित्सकों की टीमें बनाई हुई है। टीमों द्वारा बीमारी पर नियंत्रण पाने के प्रयास किए जा रहे है। इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। लक्षणों के आधार पर ही इलाज किया जा रहा है। स्टाफ की भारी कमी है। साधनों की भी कमी है। जिसके कारण काफी दिक्कतें आ रही है।

पशुपालक सुमेर सिंह भाटी सांवता का कहना हैं कि जिले के अधिकांश लोग पशुपालन पर ही निर्भर है। ऐसे में गायों में फैली बीमारी से पशुपालक चिंतित है। गायों के मरने का सिलसिला थम नहीं रहा है। पशुपालक गाय पालन कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। ऐसे में कई पशुपालकों की गायें मर चुकी है। जिले में पांच लाख से अधिक गायें है।

पशुपालक हाथी सिंह मूलाना ने कहा कि जैसलमेर जिले में पशु चिकित्सकों एवं मेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। शुरुआत में जोधपुर, पाली, सिरोही, जालौर, बाड़मेर की टीमों ने 10 दिन जैसलमेर में रहकर सर्वे कर उपचार किया था। लेकिन अब यह टीमें भी नहीं है। विशाल भू भाग में फैले जिले में स्थानीय चिकित्सकों के भरोसे इस बीमारी का रोकथाम कर पाना मुश्किल है। पशु चिकित्सकों की कमी के चलते भी दूर दराज के गांवों में पशुओं को इलाज नहीं मिल रहा है।

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