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इस मंदिर में की जाती है भगवान शिव के नाभि की पूजा

उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग जिले में मद्महेश्वर मंदिर समुद्रतल से 3289 मीटर की उंचाई पर स्थित है। मद्महेश्वर मंदिर पांच केदार में से एक है। चारो तरफ हिमालय पहाड़ो से घिरे इस स्थान से प्राकृतिक खूबसूरती देखते ही बनती है और इस मंदिर में भगवान शिव की नाभि की पूजा की जाती है।

यात्रा :

रुद्रप्रयाग से केदारनाथ जाने वाली सड़क पर गुप्तकाशी से कुछ पहले कुण्ड नामक जगह आती है जहां से ऊखीमठ के लिए सड़क अलग होती है। ऊखीमठ में मुख्य बाजार से सीधा रास्ता उनियाना जाता है जो मदमहेश्वर यात्रा का आधार स्थल है। उनियाना से मदमहेश्वर की दूरी 23 किलोमीटर है जो पैदल नापी जाती है। उनियाना के बाद रांसी आता है, यह उनियाना के मुकाबले ज्यादा बड़ा और समृद्ध गांव है और यहां राकेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर है।

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रांसी से हल्की चढ़ाई के बाद गौण्डार गांव सामने दिखाई देता है। घने जंगल से होकर गौण्डार पहुंचते है, जो इस घाटी का आखिरी गांव है। गौण्डार से डेढ़ किलोमीटर आगे आती है खटरा चट्टी, इसके बाद नानू चट्टी और फिर कुन चट्टी से जंगल शुरू हो जाता है और मदमहेश्वर से आधा किलोमीटर पहले तक जंगल ही रहता है।

मंदिर :

उत्तरभारतीय की छत्र प्रधान शैली का यह मंदिर काफी पुराना है. यहाँ के पुजारी दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के मैसूर से जंगम (चित्रकाली) कहे जाने वाले लिंगायत ब्राह्मण हुआ करते हैं। मूल मंदिर के पास ही वृद्ध मदमहेश्वर का छोटा सा मंदिर भी है. इसके अलावा लिंगम मदमहेश्वर, अर्धनारीश्वर व भीम के भी मंदिर यहाँ पर स्थित है।

इतिहास :

किंवदंतियों के अनुसार, जब भगवान शिव खुद को पांडवों से छिपाना चाहते थे, तब बचने के लिए उन्होंने स्वयं को केदारनाथ में दफन कर लिया, बाद में उनका शरीर मदमहेश्वर में दिखाई पड़ा।
एक मान्यता के मुताबिक मदमहेश्वर में शिव ने अपनी मधुचंद्ररात्रि मनाई थी।

कपाट :

आमतौर पर केदारनाथ और मद्महेश्वर के कपाट एक साथ खुलते और बंद होते है।
शीतकाल में मंदिर के अंदर रखी रजत की मूर्तियों को उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में स्थानांतरित कर दिया जाता है। वहीं ग्रीष्मकाल में पौराणिक विधि विधान के साथ मदमहेश्वर मंदिर खोला जाता है जहां देश-विदेश के शिव भक्त भगवान मदमहेश्वर के दर्शन कर विशेष पुण्य लाभ लेने हर वर्ष पहुंचते हैं।

कहा जाता है कि जो व्यक्ति मदमहेश्वर के माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है तो उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। इस क्षेत्र में पिण्डदान शुभ माना जाता है।

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