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दीपावली की रात ताश खेलने के पीछे जुड़ी हैं ये मान्यताएं…

इस बार दीपावली का पर्व 7 नवंबर को मनाया जाएगा. दीवाली को लेकर अक्सर लोग काफी तैयारियां करते हैं. ऐसे में सबके लिये दीपावली के मायने अलग-अलग है. किसी के लिये दीवाली का मतलब मिठाई खाना होता है तो किसी के लिए दीवाली का मतलब घर की साज-सज्जा करना होता है. वहीं इन सबके बीच दीवाली के दिन ताश खेलने का भी काफी प्रचलन है. यह खेल दीवाली के 2-3 दिन तक खेला जाता है. आमतौर पर लोगों का मानना है कि दीवाली में कार्ड्स खेलने से भाग्य चमक जाता है.

पौराणिक कथा के अनुसार ताश खेलना

हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, दीवाली की रात को माता पार्वती और शिव जी ने चौसर खेला था. इस खेल में मां पार्वती को जीत हासिल हुई थी. वास्तव में शिव ने जब यह पार्वती जी को खुश देखा तो वह काफी प्रसन्न हुए. क्योंकि भगवान भोलेनाथ जानबूझकर अपनी बीवी से हारे थे. उन्होंने कहा कि यह खेल जीत-हार के साथ प्रेम को बनाए रखने का भी खेल है. इससे माता पार्वती इतनी ज्‍यादा खुश हो गई थी कि उन्‍होंने कहा कि इस रात जो भी इन्‍हें खेलेगा, उसके घर बहुत समृद्धि आएगी. आइए आज हम आपको बताते हैं कि आखिरकार क्यों खेला जाता है दिवाली के दिन जुआ.

महाभारत के दौरान खेला गया चौसर

महाभारत के दौरान चक्रवर्ती सम्राट नल ने चौसर में अपना सारा राजपाट खो दिया था. उन्हें अपने कपडे़ तक बेचने पड़े थे. राजा नल ने बड़ी मुश्किल से दोबारा राजपाट हासिल किया था. वहीं महाभारत में पांडवों ने दुर्योधन संग चौसर खेला था और अपनी पत्नी द्रौपदी को हार बैठे थे. जिसके चलते सारी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ उन्हें 13 साल जंगल में वनवास काटना पड़ा था.

बदल रहा है ट्रेंड

प्राचीन काल में पत्थर या लकड़ी की गोटियों से चौसर (जुआ) खेला जाता था. इसके चार भाग होते थे और हर भाग में 16 खाने होते थे. कुल मिलाकर 64 खाने होते थे. सफेद पत्थर के पासे पर 1 से 6 तक अंक लिखे होते थे. इसके बाद पत्थर की जगह कपड़े पर ये खेल खेला जाने लगा इसमें भी चौसठ खाने होते थे. लेकिन इसे चौपड़ कहा जाने लगा. गोटियां और पासे लकड़ी के प्रयोग होने लगे. पहले इसमें गाय, अनाज और स्वर्ण मुद्राएं दांव पर लगाने का प्रचलन आया.

इसके बाद कैसिनो अस्तित्व में आया, इस खेल में 48 खाने होते थे. इसमें दांव में केवल पूंजी (रूपए-पैसे) ही लगाये जाते थे. अबतक ये खेल घर की चाहरदीवारी से बाहर सरकार द्वारा आज्ञा प्राप्त जुआघरों (कैसिनो) में खेला जाने लगा. लेकिन शास्त्रों में जुआ खेलने को व्यसन के समान माना गया है. पुराणों में भी जुआ खेलने को बुरा माना गया है. ऐसा लिखा है कि जुए में धोखा करने वाला नरक में जाता है और उसे बहुत सी यातनाएं झेलनी पड़ती हैं और उसपर मां लक्ष्मी की कृपा नहीं होती है.

 

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