मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य 24 कैरेट गोल्ड जैसा खरा: डॉ़ दीक्षित

उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (बुंविवि) में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती के अवसर पर बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में हिंदी साहित्य को उनकी अनुपम भेटों के लिए याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गयी ।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के गांधी सभागार में हिंदी विभाग और संत कबीर अकादमी लखनऊ के तत्वावधान में “ कबीर के राम. मैथिली शरण गुप्त के राम” विषय पर गांधी सभागार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के प्रोफेसर डा. उमापति दीक्षित ने कहा कि राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त का साहित्य 24 कैरेट गोल्ड की तरह खरा है। उनकी रचनाएं हर निराश मन में आशा का संचार करती हैं। उन्होंने श्रीगुप्त की रचना नर हो न निराश करो मन का पाठकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

प्रो. दीक्षित ने कहा कि काशी का रहने वाला हूं, वह कबीर और तुलसीदास दोनों को प्रिय रही है। राष्ट्र कवि की रचनाओं ने उनके जीवन को सही दिशा दी। उन्होंने रावण रचित शिव स्तोत्र पेश की। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की एक चौपाई का उदाहरण देकर राम की विशेषताओं का उल्लेख किया। मैथिली शरण गुप्त वैष्णव भक्ति में रमे हुए थे। उनकी रचनाओं में यह साफ दिखता है। राम घट घट में व्याप्त हैं। उनके नाम के सुमिरन मात्र से सभी दुखों का अंत होगा। ऐसा अनेक साहित्यकार बता गए हैं। राम के संघर्ष में हर व्यक्ति अपने संघर्ष को देखता है। उनसे ऊर्जा ग्रहण करता है।

इस अवसर पर बुंविवि के कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने कहा कि मैथिली शरण गुप्त का साहित्य भावी पीढ़ी के लिए प्रासंगिक रहेगा। साहित्य के माध्यम से ही हम अपने पूर्वजों की सोच. जीवन मूल्य और कार्यशैली के बारे में जानकारी हासिल कर पाते हैं। भगवान राम के कार्यों को साहित्यकार किस रूप में देखते हैं यह जानकारी साहित्य देता है। राम का चरित्र हर व्यक्ति को जीवन पथ पर आगे बढ़ने. विभिन्न बाधाओं का सामने करने का आत्मबल देता है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष का राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त सम्मान पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक को दिया जाएगा। निशंक ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण में अहम योगदान दिया है। कुलपति ने उम्मीद जताई कि संगोष्ठी सफल रहेगी। विशिष्ट अतिथि सागर विश्वविद्यालय के प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि राम नाम का आलोक नई पीढ़ी में प्रवाहित होना चाहिए। कबीर के राम और मैथिली शरण गुप्त के राम के बीच बड़ा अंतराल है।

हर काल के रचनाकारों ने अपने अपने समय के अनुसार अपने अपने ढंग से राम को देखा और परिभाषित किया है। देश की रक्षा और उन्नयन के लिए राजा के मन में त्याग होना अत्यंत आवश्यक है। राम को समझना जीवन की बड़ी साधना है। कुलपति प्रो. पाण्डेय और सभी अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डा. अचला पाण्डेय ने किया। अंत में आभार डा. मुन्ना तिवारी ने व्यक्त किया।

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