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माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को सारी व्याधियों से ले जाती है दूर

चतुर्थी के दिन नवरात्रि के माँ कुष्माण्डा देवी की उपासना की जाती है। आज के दिन मां को पूर्ण पवित्र और अचंचल कर कूष्माण्डा देवी की पूजा-उपासना करनी चाहिए। इनका वाहन सिंह है।

 

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माँ  कुष्मांडा की आठ भुजाएँ हैं। ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, बाण, कमल-पुष्प, घनुष, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है।

 

माँ की भक्ति करने आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है व भक्तों के सारे रोग-शोक मिट जाते हैं।

माँ की उपासना करने से मनुष्य भवसागर से पार पा जाता है | उसे सारे सुख़- सुविधा वैभव की प्राप्ति होती है|

माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से दूर ले जाने वाली है।

यह श्लोक सर्व सिधियो को देने वाला है

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

 

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे आपको बारंबार प्रणाम है|

माँ कूष्माण्डा को “कुम्हड़” कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी माँ कूष्माण्डा कहलाती हैं।

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