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जाने, क्यों खास है मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू?

मकर संक्रांति के दिन तिल के लड्डू खाए जाते हैं। तिल के लड्डुओं का दान किया जाता है। यह हिंदू धर्म में एक बहुत बड़ी परंपरा है। साल 2020 का मकर संक्रांति पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म के अनुसार जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन मकर संक्रांति का योग बनता है और उसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इसे लगभग भारत के हर कोने में मनाया जाता है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। मकर संक्रांति के साथ तिल का विशेष महत्व है। तिल के लड्डू, तिल के गजक का उपयोग इस दिन खास तौर पर किया जाता है।

तिल का इस दिन इतना अधिक महत्व है कि मकर संक्रांति का एक और नाम से तिल संक्रांति भी है।

इसके पीछे एक कथा है मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और मकर राशि के स्वामी शनि है। सूर्य और शनि वैसे तो पिता पुत्र हैं लेकिन इनकी आपस में कभी नहीं बनती। ऐसे में जब सूर्य देव मकर राशि यानी कि शनि की राशि में प्रवेश करते हैं। तो तिल की उपस्थिति होने के कारण शनिदेव इन्हे किसी तरह का कष्ट नहीं पहुंचा पाते।

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इस दिन तिल के लड्डू ना सिर्फ खाने बल्कि दान देने का भी बहुत अधिक महत्व है। माना जाता है कि सूर्य देव की दो पत्नियां थी छाया और संज्ञा। उनका पुत्र शनि, सूर्य देव और छाया के बेटे हैं। जबकि यमराज उनकी दूसरी पत्नी संज्ञा के बेटे हैं। हिंदू धर्म और पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सूर्य देव ने छाया को संज्ञा के पुत्र यमराज के साथ भेदभाव करते देखा और  वे नाराज हो गए। नाराज होकर उन्होंने खुद को शनि और छाया से अलग कर दिया। जिससे शनि और छाया ने क्रोधित होकर सूर्य को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। यमराज ने कठोर तपस्या की और सूर्य देव को कुष्ठ रोग से मुक्त तो करा दिया।

लेकिन इससे नाराज होकर सूर्य ने शनि का घर कहे जाने वाले कुंभ राशि याने की कुंभ, उनके घर को नष्ट कर दिया। जिससे शनि और छाया को बहुत तकलीफ हुई। यमराज की प्रार्थना करने पर सूर्य ने शनि और छाया को माफ कर दिया।
जिस समय सूर्य ने शनि के ग्रह को जलाया था वहां पर सब कुछ जल गया था सिवाय तिल के।

शनि ने उसी तेल से सूर्य की पूजा की और सूर्य ने शनि को आशीर्वाद दिया कि आज के दिन यानी कि मकर संक्रांति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा होगी, तो शनि का भी दोष पूजा करने वाले व्यक्ति के ऊपर से हट जाएगा।

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