Breaking News
Home / ज्योतिष / शूर्पणखा बनी रावण के सम्पूर्ण कुल विनाश का कारण

शूर्पणखा बनी रावण के सम्पूर्ण कुल विनाश का कारण

शूर्पणखा रोती-बिलखती लंका की ओर भागी और अपने भाई के पास जाकर बोली –अरे रावण! तेरे बल-पराक्रम को धिक्कार है| राम नामक एक आदमी ने मेरी नाक के साथ तेरी भी नाक काट दी।

रावण बड़े दर्प से बोला–लेकिन शूर्पणखा! उसने तेरा अंग-भंग किया क्यों ? कौन है वह राम? दण्डक वन में वह क्यों आया?

Loading...

शूर्पणखा ने कहा–भैया! राम अयोध्या के राजा दशरथ का बेटा है । उसके बाप ने उसे राज्य से निकाल दिया है । वह बड़ा बलवान और रण-कुशल, धनुर्धर है । मैंने वन में एक रूपवती नारी सीता को देखा और उसे में अपने भाई रावण के लिए लाना चाहती थी लेकिन उन्होंने मेरी नाक काटकर मुझे खरी खोटी सुनाई और मेरे कुल आपका बहुत अपमान किया । भैया, खर-दूषण तथा समस्त राक्षसों को मारकर उसने दण्डकारण्य पर अधिकार कर लिया है । उसके साथ उसका शूरवीर भाई लक्ष्मण भी है और सुनो, राम अपने साथ अपनी अनुपम रूपलावण्यवती स्त्री सीता को भी ले आया है । वह विश्वसुन्दरी तुम्हारे योग्य है । मैं उसको तुम्हारे लिए लाना चाहती थी । बस, इसीलिए दुष्ट लक्ष्मण ने मेरी नाक दी  । भैया! उस रमणी को हाथ से न जाने दी ।

 

रावण ने शूर्पणखा की बातों से उत्तेजित होकर तुरन्त अपना आकाश-गामी यान मंगवाया । कुटिल चाल सोचकर राम के अपमान करने के लिए उसने सीता का हरण करने का निश्चय किया और मारीच के पास गया |  समुद्र के किनारे  एक आश्रम में ताड़का-पुत्र मारीच मुनि बनकर रहता था । मारीच ने राक्षसराज का यथोचित सत्कार करके उसके पधारने का प्रयोजन पूछा ।

रावण ने मारीच को साडी कहानी कह सुनाई | मैं उसकी सुन्दरी स्त्री का अपहरण करके इसका बदला लेना चाहता हूं । यह कार्य तुम्हारे जैसे मायावी की सहायता से ही हो सकता है । मैं चाहता हूं कि तुम स्वर्ण-मृग का रूप धारण करके सीता के सामने जाओ और उसे अपनी ओर आकर्षित करो । वह राम से ऐसी विचित्र वस्तु के लिए हठ करेगी । जब राम तुम्हें पकड़ने दौड़े तो तुम भागकर दूर निकल जाना और वहां से राम के स्वर में ‘हा लक्ष्मण! हा सीता!’ कहकर चिल्लाना । इसे सुनकर सीता व्यग्र हो जाएगी और लक्ष्मण को राम की खोज-खबर लेने अवश्य भेजेगी । बस, मेरा काम बन जाएगा । मैं सीता को हर लाऊंगा । उसके बाद कामी राम पत्नी के वियोग में या तो छटपटाकर मर जाएगा अथवा इतना निर्बल हो जाएगा कि मैं उसे आसानी से जीत लुंगा

मारीच ने बहुत समझाया रावण को -राक्षसों को अकेले मारने वाला राम साधारण योद्धा नहीं है । आपको उनका आदर करना चाहिए| उनकी स्त्री का अपहरण आपके लिए कलंक की बात होगी । आप राजा होकर कुमार्ग में पैर न रखिए । इसी में हमारा-आपका और सारी राक्षस जाति का कल्याण है ।

 

 

 

मारीच का व्याख्यान रावण को प्रिय नहीं लगा । वह क्रुद्ध होकर बोला तभी मारीच विवश होकर पंचवटी पहुंचे । मायावी मारीच अतिसुन्दर स्वर्ण-मृग का रूप धारण करके गया | उस मायामृग पर सीता का मन मोहित हो गया सीता ने राम को उसको पकड़ने का आग्रह किया । राम को उसके विषय में कुछ संदेह तो हुआ, लेकिन वे भी धोखे में पड़ गए और लक्ष्मण को सीता की रखवाली का भार सौंपकर स्वयं धनुष-बाण लेकर मृग पकड़ने दौड़े ।

 

 

कुछ देर पश्चात  वह तत्काल राम के स्वर का अनुकरण करके चिल्लाया–‘हा सीता! हा लक्ष्मण! मैं मारा गया!मुझे बचाओ ।

इधर सीता उस पुकार को सुनते ही व्याकुल होकर लक्ष्मण से बोली–लक्ष्मण! तुमने भाई का आर्तनाद सुना! निश्चय ही वे किसी महान् संकट में पड़ गए हैं । तुम उनकी रक्षा के लिए तुरन्त जाओ ।

लक्ष्मण ने एक रेखा खीची और सीता से कहा भाभी जब तक हम न आ जाये तब तक तुम बाहर न आना

दुराग्रह और दुर्वचनों से लक्ष्मण को अत्यन्त दुःख हुआ । वे धनुष-बाण लेकर राम की खोज में चले गए । रावण इसी अवसर की प्रतीक्षा में पास ही छिपा बैठा था । उसने तत्काल सन्यासी का वेश धारण किया । एक हाथ में दण्ड-कमण्डलु लिए और दूसरे हाथ में छाता लिए वह वेद-मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ और भिक्षा मांगे लगा|

सीता ने लक्ष्मण रेखा में रहकर ही भिक्षा दी तो साधू वेश में रावण ने लेने से इनकार कर दिया| तभी सीता को रेखा के बाहर आकार भिक्षा देनी पड़ी और रावण अपने असली रूप में आ गया|

 

रावण ने खड़े-खड़े गम्भीर स्वर में कहा–सीते! सुन, मैं वह प्रतापी लंकापति राक्षसेन्द्र रावण हूं, मेरी इच्छा है कि तू राम को त्यागकर मेरी स्वर्णमयी महापुरी लंका में चल और मेरी पटरानी बनकर संसार का सुख़ भोग!

 

सीता चौंककर पीछे हट गई और उस वंचक को डांटती हुई बोली, रे नीच! अभी यहां से भाग जा, नहीं तो मेरे पतिदेव आते ही होंगे, वे तेरे जैसे पापी को कभी जीता न छोड़ेंगे ।

 

 

रावण ने अधिक विलम्ब न करते हुए सीता को हर लिया | वह बार-बार राम-लक्ष्मण का नाम लेकर चिल्लाने और छटपटाने लगी । रावण आकाशमार्ग से लंका की ओर चल पड़ा ।

 

 

आगे जाने पर एक बहुत बड़ा जीव बैठा दिखाई पड़ा । वह जटायु था । सीता ने आकाश से उसको पुकारकर कहा–आर्य दौड़ो, बचाओ…! मैं राम की पत्नी सीता हूं…मुझे दुष्ट रावण ले जा रहा है… ।जटायु सीता का आर्तनाद सुनते ही चौंक पड़ा । राक्षसराज, ऐसा अधर्म न करो । इससे तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा… ।छोड़ दो सीता माँ को|

रावण ने यान को रोककर तीक्ष्ण बाणों से जटायु पर प्रहार किया । रावण ने तलवार से उसके दोनों पर काट डाले । जटायु तड़पने लगा |

रावण ने सीता को ले जाकर अशोक वाटिका में रखा | उसको सभी ने समझाया लेकिन उसने किसी की भी न सूनी | मंदोदरी ने भी उसे सचेत किया लेकिन वह नही माना| विभीषण राम का छोटा भाई था उसने भी रावण को लाख समझाने की कोशिश की लेकिन रावण ने उसे भी खरी-खोटी सुनाई|

तभी राम-लक्षमण सीता को वन -वन सीता को ढूढने लगे | तभी जटायु ने सारा हाल कह सुनाया की सीता को रावण हरण कर ले गया है|

लम्बे समय के अंतराल बाली वध के बाद सुग्रीव हनुमान सहित राम-लक्ष्मण ने समस्त वानर सेना का सहारा लेकर लंका पर चढाई से पहले हनुमान को लंका भेजा सीता का हाल जानने के लिए|  हनुमान ने आकाश मार्ग से लंका गये तब देखा की यहाँ तो तुलसी का पेड़ है जरूर यहाँ राक्षसों के बीच कोई पुण्य आत्मा भी है | फिर वह विभीषण से मिले| विभीषण ने सभी हाल बताया और माँ सीता का पता भी बताया की माता अशोक वाटिका में है | वहाँ हनुमान ने अपना परिचय दिया और सीता को यकीं न आया तो हनुमान ने राम की निशानी अंगुठी दिखाई| और माँ सीता से उनकी जुडामणि निशानी रूप में ली | और प्रस्थान किया तभी रावण ने हनुमान को बंधी बना लिया और उनकी पूंछ में आग लगा दी| लेकिन हनुमान ने भी अपनी पूंछ मात्र से सोने की लंका को जला डाला और अक्षय कुमार को भी मार डाला|

और राम को जाकर सारा हाल सुना दिया और सीता माता की जुडामणि भी दी| राम ने देखते ही रोते कहा – हे सीते मै आ रहा हूँ|

विभीषण आकार राम से मिले उन्होंने लंका का सारा हाल व गुप्त बातें भी बताई और कहा की मुझे रावण ने लंका से भागा दिया है क्योंकि मैने उससे सीता माता को वापस लौटा देने के लिए बहुत समझाया परन्तु उसने एक न मानी और मुझे लात मार भगा दिया | मेरी माता ने कहा की मै आपकी शरण में आ जाऊ |

राम ने विभीषण से लंका जाने का रास्ता पूछा तब विभीषण ने बताया इसका बस एक ही रास्ता है आप समुद्र से रास्ता मांगिये ! 3 दिन तक उन्होंने समुद्र से प्रार्थना की | समुद्र देवता नही आये तो राम ने अपना धनुष उठाया और कहा- की मै 3 दिनों तक तुम्हारी तपस्या कर रहा हूँ, लेकिन तुमने कोई उत्तर नही दिया| मै अब तुम्हे सुखा देता हूँ| सुनते ही समुद्र देवता प्रकट हुए और माफ़ी मांगी| और कहा- प्रभु नल-नीर नामक 2 वानर आपकी सेना मै है अगर वो राम-राम लिखकर शिला तैलाये तो रवह डूबेंगे नही और आपका रास्ता बन जायेगा|

फिर राम जी ने भोलेनाथ जी से प्रार्थना की और भोलेनाथ जी ने विजय का आशीर्वाद दिया |

वानरो ने राम- नाम लिखकर शिला डाली और पुल बन गया मात्र 5 दिनों में लंका जाने के लिए| सभी ने देखा की वानर सेना सहित राम-लक्ष्मण आ रहें है| और रावण को सुचना दी|

फिर रावण को समझाने के लिए, शांति दूत अंगद को भेजा लेकिन रावण ने एक न सूनी| अंगद ने कहा की तुम पूरी लंका में से कोई भी मेरा पैर हिलाकर दिखाओ | किसी ने भी एक पल भी एक पग भी न हिला सका | मेघनाथ भी अंगद का पैर न उठा सका\ फिर रावण आया तो अंगद ने पैर हटा लिया और उसका मुकुट गिर गया और कहा की मेरे चरण पकड़ने से क्या होगा जाकर प्रभु राम के चरण पकड़ो अपने कल्याण के लिए| और अंगद उस मुकुट को राम के चरण में डाल देता है | फिर युद्ध आरम्भ होता है|

सर्वप्रथम सुग्रीव ने “व्रजमुस्ठी” को मार दिया जो लंका का व्रज था| उसके बाद हनुमान के हाथों “दुर्मुख” मरता है| जो लंका का मुख था | उसके बाद लंकेश का पुत्र प्रहस्त लक्ष्मण के हाथों मारा जाता है| खर का पुत्र “मक्राक्ष” अपनी माँ को वचन देता है की मै राम की खोपड़ी में जल भरकर अपने पिता का तर्पण करूँगा | और वह युद्ध के लिए जाता है और मक्राक्ष राम के हाथों मारा जाता है|

इसके बाद रावण स्वयं जाता है युद्ध में लेकिन राम उसको निशस्त्र कर देते है | और भगवान राम निशस्त्र पर हाथ नही उठाते और राम ने कहा की कल शस्त्र के साथ आना|

उसके बाद बारी आती है कुम्भकर्ण की (जो पूरी साल सोता था क्योंकि उसे ब्रह्मा जी का वरदान था) | लेकिन वह रावण को बहुत समझाता है की आप जिसको हर कर लाये हो वो साक्षात् जगदम्बा है | लेकिन रावण ने कुम्भकर्ण की बुद्धि फेर दी और उसको युद्ध के लिए भेजा| कुम्भकर्ण का सिर राम के बाण से समुद्र में जा गिरता है और वह भी युद्ध में मारा जाता है|

 

अतिकाये को व्रह्मस्त्र से लक्षमण मारते है | देवान्तर फिर दारुक, की मरतु होती है| एक-एक करके रावण के समस्त पुत्र मारे जाते है|

उसके पश्चात् मंदोदरी का पुत्र मेघनाथ जाता है युद्ध में | मेघनाथ के बाण से लक्ष्मण मुर्छित हो जाते है| फिर हनुमान संजीवनी बूटी को न ढूढ़ सकने के कारण पूरा पहाड़ ही उठा लेट है और लक्ष्मण को जिला देते है| उसके बाद मेघनाथ का वध होता है और उसके पश्चात् रावण राम के बाण से मारा जाता है| इस प्रकार रावण का अंत होता है | और विभीषण को लंका का राज दे दिया जाता है|

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *