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तपती गर्मी और विद्युत आपूर्ति की मांग

ऊर्जा की लगातार बढ़ती हुई मांग और बढ़ता तापमान, दुनिया की दो सामान्य परिघटनाएं हैं। और भारत भी उसी स्थिति से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक वृद्धि, बेहतर एक्सेस और आधुनिकीकरण के चलते भारत की ऊर्जा आवश्यकता तेज दर से बढ़ रही है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी ऑथोरिटी (‘‘सीईए’’) की रिपोर्ट ‘‘ग्रोथ ऑफ इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर इन इंडिया 1947-2017’’ के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति विद्युत खपत लगातार बढ़ी है और यह वित्त वर्ष 2006 के 631.4 किलोवाट प्रति घंटा (kWh) से बढक़र वित्त वर्ष 2017 में 1,122.0 किलोवाट प्रति घंटा हो चुकी है। सीईए की वार्षिक रिपोट्र्स के अनुसार, 11 वर्षों में 77.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
एक प्रेस विज्ञप्ति में, क्रिसिल इंफ्रास्ट्रक्चर एडवायजरी के वरिष्ठ निदेशक,विवेक शर्मा ने कहा, ‘‘हमें एक बहुत बड़ी समस्या दिखाई दे रही है, क्योंकि पिक पावर कमी परिदृश्य में कोई सुधार की संभावना नजर नहीं आ रही है।

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वित्त वर्ष 2007 और वित्त वर्ष 2017 के बीच, भारत की पिक मांग लगभग 5 प्रतिशत चक्रवृद्धि के वार्षिक दर (‘‘सीएजीआर’’) से 159.54 ळॅ पर पहुंच गई, जबकि स्थापित विद्युत उत्पादन उक्त अवधि के दौरान लगभग 10 प्रतिशत सीएजीआर की दर से 200 ळॅ से बढक़र 327 ळॅ हो गया। यह सकल घरेलू उत्पाद में स्वस्थ वृद्धि के चलते संभव हुआ है, यद्यपि वितरण कंपनियों के बिगड़ते आर्थिक स्वास्थ्य ने विकास को प्रभावित किया है।

पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज गति से वृद्धि हुई है और इसने दुनिया की अन्य कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ दिया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2017 से 2022 के दौरान भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि 8.5 प्रतिशत रहेगी।

2018 – गर्मियों के अधिक तपने का अनुमान!

भारतीय मौसम विभाग द्वारा तापमानों के लिए मौसमी अनुमानों के अनुसार, राज्यों में आगामी गर्मी के मौसम (अप्रैल से जून – एएमजे) में सामान्य सब-डिविजनल औसत मौसमी तापमान
अधिक रहने का पूर्वानुमान है। देश के पूर्वी, पूर्व-मध्य और दक्षिणी हिस्सों में तापमान थोड़ा
कम रहने का अनुमान है। गर्मी बढऩे के साथ-साथ, देश में विद्युत की मांग बढ़ रही है। मार्च
2018 में बिजली की मांग वर्ष-दर-वर्ष आधार पर लगभग 10 ळॅ अधिक है।

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आगे का भविष्य?

विद्युत खपत की दृष्टि से, वित्त वर्ष 2016 के दौरान, औद्योगिक क्षेत्र में 30 प्रतिशत, घरेलू
क्षेत्र मे 29 प्रतिशत , कृषि क्षत्रे मे  21 प्रतिशत, वाणिज्यिक क्षेत्र मे 12 प्रतिशत और बाकी विद्युत
की खपत अन्य श्रेणियो में हुई। हालांकि बिजली की बढ़ती उपलब्धता विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों
में, खर्च योग्य आमदनी में वृद्धि और कृषि को अधिक आपूर्ति के मद्देनजर, खपत पैटर्न में
परिवर्तन होने का अनुमान है।

आगे, बिजली की अधिक मागं की यह प्रवृत्ति जारी रहने का अनुमान है। मागं में वृद्धि के
मुख्य कारको में निम्नलिखित पहले शामिल हैं, जैस- ‘सभी के लिए 24/7 विद्युत’, ‘स्मार्ट
शहरों’ का विकास, ‘सभी के लिए आवास’ योजना, ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए औद्योगिक प्रोत्साहन, बढ़ता शहरीकरण, ढांचागत आवश्यकताएं, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और संपूर्ण रूप से दमदार आर्थिक विकास।

शर्मा ने आगे कहा, ‘‘वर्ष 2018 और 2019 में 4 करोड़ अतिरिक्त घरों का विद्युतीकरण किया जायेगा, इस तथ्य के मद्देनजर, मांग बढ़ेगी। और साथ ही कुछ सामान्य चुनावों और राज्य चुनावों का भी असर पड़ेगा। इसके अलावा, घरेलू कोयला आपूर्ति की कमी हो जायेगी, जिसका अर्थ है कि आयातित कोयला पर निर्भरता बढ़ेगी, जिसकी कीमत ऊंची बने रहने का अनुमान है। इससे बिजली की सीमांत लागत बढ़ेगी ही।’

विभिन्न उपभोक्ता वर्गों से बढ़ती मांग के चलते न केवल अतिरिक्त क्षमताओं की स्थापना की आवश्यकता होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मौजूदा इकाइयां अधिक पीएलएफ पर काम करें। उच्च पीएलएफ पर इकाइयों के चलने से ऊर्जा की अत्यधिक उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी, जिससे बढ़ती मांग पूरी हो सकेगी। ऊर्जा इकाइयों की आपूर्ति में वृद्धि से मांग-आपूर्ति ऊर्जा की खाई को पाटने में मदद मिलेगी। वित्त वर्ष 2022 तक कुल उपलब्ध ऊर्जा का 1,763 बिलियन इकाइयों तक पहुंचने का अनुमान है।

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