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अगरबत्ती, धूपबत्ती से पड़ रहे हैं लोग बीमार

हम रोजाना सुबह नहा धोकर पूजा-पाठ में लग जाते हैं। भगवान से दुआ करते हैं कि हमारा दिन अच्छा और सुखद हो। इसके लिए भगवान के सामने अगरबत्ती जलाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगरबत्ती या धूपबत्ती हमारे स्वास्थ्य के लिए जानलेवा है। दरअसल अगरबत्ती या धूपबत्ती कई बार घटिया सामग्री का इस्तेमाल से बनाई जाती है। इसमें पॉलीएरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) का यूज होता है ताकि अच्छी खुशबू आए। लेकिन इसके जलाते हुए इससे निकलने वाले धुएं में केमिकल की काफी मात्रा होती है। धुंए में मौजूद हाइड्रोकार्बन सेल मेम्ब्रेन में चिपक जाते हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। एक शोध ने भी इस बात को पुष्ट किया है। जानें अगरबत्ती और धूपबत्ती से होने वाली जानलेवा बीमारियों के बारे में-
खून में घुलना
अगरबत्ती या धूपबत्ती में प्रयोग होने वाले केमिकल्स धुंए के साथ आपके फेफड़ों में पहुंचते हैं और आपको बीमार बना सकते हैं। लंबे समय तक धुएं के संपर्क में रहने से हाइड्रोकार्बन फेफड़ों में जमता जाता है। इसे देखने पर ये तत्व फेफड़ों में चारकोल के चिपकने जैसा लगता है। ये विषाक्त रसायन फेफड़े की झिल्लियों में संक्रमण पैदा कर जीवन पर खतरा बन रहे हैं। यही नहीं धुएं में डामर की तरह पाया जाने वाले रसायन में कई भारी तत्व एवं हाइड्रोकार्बन होते हैं, जो 10 माइक्रान से छोटे होने पर सीधे रक्त में दाखिल हो सकते हैं। ऐसे में ये आपकी किडनी, लिवर और दिल को भी प्रभावित कर सकते हैं।
सांस संबंधी बीमारी
अगरबत्‍ती और धूपबत्‍ती में ऐसे ढेर सारे हानिकारक तत्व होते हैं, जो इंसान की सेहत के लिए बहुत खतरनाक माने जाते हैं जैसे- सल्‍फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन और फॉर्मल्डेहाईड आदि। ये केमिकल्स छोटे कणों और गैस के रूप में मौजूद होते हैं। इनके संपर्क में अधिक समय तक रहने से अस्‍थमा और सीओपीडी जैसी श्‍वसन संबंधी समस्‍या हो सकती है। इसके धुंए में लगातार रहने से फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन आ सकती है।
और भी हैं बीमारियां
अगरबत्तियों से निकलने वाला केमिकलयुक्त धुंआ आपके नर्व्स को भी प्रभावित करता है। इसलिए लंबे समय तक प्रयोग से इसका असर आपके दिमाग पर भी पड़ता है। इसके कारण सिरदर्द और एकाग्रता की कमी की समस्या हो जाती है। कई बार लोग डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसे रोगों के भी शिकार हो जाते हैं। चूंकि बहुत छोटे कण खून में भी घुल जाते हैं इसलिए इसके कारण खून में जानलेवा गैसों की मात्रा बढ़ने से मस्तिष्क की कोशिकायें प्रभावित होती हैं जिसके कारण तंत्रिका से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।

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