मायावती के NDA का साथ देने के पीछे ये है सियासी गणित, वेस्‍ट UP में SP-RLD को बड़ी चुनौती

बसपा सुप्रीमो मायावती ने उपराष्‍ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्‍मीदवार के समर्थन का ऐलान कर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। इस फैसले के जरिये वह पश्चिमी यूपी में जाट-दलित और मुस्लिम वोट बैंक को साध कर समाजवादी पार्टी और रालोद के लिए चुनौती खड़ी करने की कोशिश में हैं तो वहीं जाट प्रत्याशी को समर्थन कर उन्होंने रालोद को भी पसोपेश में डाल दिया है कि वो जाट प्रत्याशी के चलते क्या फैसला करती है।

बसपा सुप्रीमो की घोषणा से एक बार फिर विपक्षी खेमे में हलचल मच गई है। सवाल उठ खड़ा हुआ है कि मायावती बार-बार विपक्षी एकता की चर्चाओं-दावों के बीच एनडीए के साथ क्यों खड़ी हो रही हैं? एनडीए उम्मीदवार को दोनों बड़े चुनावों में समर्थन देने की वजह जातीय समीकरण से ही जोड़कर देखी जा रही है।

द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समुदाय से हैं तो जगदीप धनखड़ जाट। मायावती हमेशा दलितों कमजोरों का खुद को नेता करार देती रही हैं। ऐसे में धनखड़ को समर्थन कर उन्होंने पश्चिमी यूपी में जाट समुदाय को साधने का संदेश दिया है।

कभी था गढ़

एक जमाने में पश्चिमी यूपी को बसपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। जाट, जाटव और मुस्लिम के सहारे बसपा बाजी मरती रही है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में इसमें सेंधमारी हुई है। दरअसल, मायावती इस खोए हुए जनाधार वापस पाने की चेष्टा में भी हैं।

रालोद को भी घेरने की कोशिश

मायावती यूपी में सपा का विरोध करती रही हैं। वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन को अपनी भूल मानती हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्ता में दुबारा वापस आने की वजह भी सपा को मानती हैं।

कहती रही हैं कि मुस्लिम मतदाता अगर सपा के बहकावे में न आते तो शायद तस्वीर भी कुछ और होती है। सियासी जानकारों का मानना है कि इसके जरिये मायावती आगामी लोकसभा चुनाव में सपा-रालोद के पश्चिमी यूपी में गठबंधन को भी कसौटी पर ले लिया है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की आलोचना की चिंता नहीं की

मायावती ने दोनों चुनावों में एनडीए के प्रत्याशी का समर्थन कर साहसी सियासी निर्णय लेने का भी परिचय दिया है। मायावती हमेशा सपा, कांग्रेस और आप आदमी पार्टी के निशाने पर इस बात को लेकर रहती हैं कि वह भाजपा की ‘बी’ टीम हैं। इस फैसले के चलते वह एक बार फिर निशाने पर हैं

लेकिन उन्होंने न केवल अपने काडर को ट्वीट के जरिये समर्थन करने का कारण स्पष्ट किया है बल्कि इसे व्यापक जनहित और बसपा के मूवमेंट से जोड़कर अपने तर्क गढ़े हैं। भाजपा को घेरने के लिए जहां विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रयास किया जा रहा हो ऐसे में उनका एकला चलो का फार्मूला उनका साहसी सियासी निर्णय ही कहा जा सकता है।

कुछ तथ्य

-पश्चिमी यूपी में बसपा के गिरीश जाटव बड़े नेता हैं
-सुनील चित्तौड़ साथ छोड़कर चंद्रशेखर आजाद के साथ चले गए हैं
-मुस्लिम नेताओं में मुनकाद अली और नौशाद अली हैं
-बड़े नेताओं में अधिकतर साथ छोड़ कर दूसरे दलों में चले गए हैं
-पश्चिमी यूपी में बसपा ने 2022 विधानसभा चुनाव में 39 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे

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