पितृपक्ष को लेकर गया और पुनपुन मे लगने वाले मेले पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं

कोरोना महामारी के चलते इस बार पितृपक्ष मेला को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। बिहार के गया और पुनपुन में पितृपक्ष के दौरान एक पखवारे तक पितृपक्ष मेला लगता है। इस मेलें मे विदेशों से भी लोग अपने पितरों को पिंडदान करने पहुँचते है। अगस्त्य तर्पण के साथ ही पितरों का तर्पण पहले दिन से ही शुरू हो जायेगा।

सनातन धर्मावलंबियों का पवित्र पितृपक्ष भाद्रपक्ष शुक्ल पूर्णिमा बुधवार दो सितंबर से शुरू होने वाला है। हालांकि अभी तक इन मेलों के आयोजन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर किसी तरह की तैयारी नहीं दिख रही है। पटना से सटे पुनपुन में भी हर साल पितृपक्ष मेला लगता है। लेकिन अभी तक मेले के आयोजन को लेकर अधिकारियों का दौरा तक नहीं हुआ है। वैसे पुनपुन में भले ही प्रशासनिक स्तर पर पितृपक्ष मेला के आयोजन को लेकर कोई तैयारी नहीं है लेकिन पिंडदान करने वालों का आना शुरू हो चुका है। वहीं पुनपुन में अंतर्राष्ट्रीय पितृपक्ष मेले को लेकर स्थानीय प्रशासन कुछ स्पष्ट नहीं कह रहा। पुनपुन सीओ इंद्र्राणी देवी व बीडीओ उदय कुमार ने बताया कि, “मेला को लेकर जिले से अब तक कोई मार्गदर्शन नहीं आया है। हालांकि, उन्होंने संभावना जताया है कि कोरोना को लेकर सरकार के द्वारा जो प्रतिबंध लगाया गया है,  पितृपक्ष मेला भी उस प्रतिबंध के अंतर्गत ही आता है। इस मेले मे लोगों की बहुत भीड़ होती है इस वजह से मेला का आयोजन संभवत: नहीं हो पायेगा”। उन्होंने आगे कहा कि, “मेला का आयोजन होता तो इसकी तैयारी एक सप्ताह पूर्व से ही शुरू हो जाती थी। जिला के वरीय अधिकारियों का दल पुनपुन मेला स्थल का मुआयना कर चुके होते”।

गौरतलब हो कि एक पखवारे तक चलने वाले पितृपक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जायेगा। पितृपक्ष का समापन आश्विन मास की अमावस्या यानी 17 सितंबर को होगा।इस पखवारे के दौरान श्रद्धालु गंगा सहित पवित्र अन्य नदियों के किनारे और घरों में श्रद्धालु अपने अपने पितरों को याद करके पिंडदान श्राद्ध व तर्पण करेंगे। हालांकि सनातन धर्म को माननेवाले जिनको तर्पण करना होता है उन्हें तो पूरे साल तर्पण करना चाहिए अगर ऐसा नहीं कर सकते तो कम-से-कम पितृपक्ष में तो अवश्य तर्पण, अन्नदान, तथा संभव हो तो पार्वण श्राद्ध करना चाहिए। ऐसा मान्यता है कि तर्पण करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है तथा पितृ दोष का निवारण होता है। पितृपक्ष के दौरान जिस तिथि को जिन पूर्वजों की मृत्यु हुई हो उस दिन ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। तिथि पता नहीं होने पर मातृनवमी को स्त्री वर्ग के निमित्त तथा अमावस्या के दिन पुरुष वर्ग के निमित्त ब्राह्मण भोजन कराने का विधान है। इस वर्ष 11 सितंबर को मातृनवमी है। वहीं अमावस्या 17 सितंबर को है।

शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में, पुण्यतिथि के दिन तथा  अमावस्या तिथि को पितर लोग वायु रूप में घर के दरवाजे पर आकर सुबह से शाम तक इन्तजार करते हैं तथा अपने पुत्रों /वंशजों द्वारा तर्पणादि कार्य नहीं करने पर क्षुधा की पूर्ति नहीं होने के कारण कुपित होकर अपने लोक को लौट जाते हैं।