बिना ब्रांड वाले खाने-पीने की वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से मुक्त रखा जाए : चैंबर

वाणिज्य एवं उद्योग संगठन बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (बीसीसीआई) ने केंद्र एवं बिहार सरकार से जनहित में बिना ब्रांड वाले खाद्यान्न को कर से मुक्त रखे जाने का आग्रह किया है। चैंबर के अध्यक्ष पी. के. अग्रवाल ने गुरुवार को केंद्रीय वित्त मंत्री, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद एवं बिहार के उप मुख्यमंत्री सह वित्त (वाणिज्य कर) मंत्री से आग्रह किया कि जनहित में बिना ब्रांड वाले खाद्यान्न को कर से मुक्त रखा जाए और किसी भी परिस्थिति में इन वस्तुओं को पांच प्रतिशत के कर दायरे में नहीं लाया जाए।

उन्होंने कहा कि इन वस्तुओं को कर के दायरे में लाने से पूर्व व्यवसायियों से परामर्श कर आम सहमति बनाने के बाद ही किसी प्रकार का निर्णय लिया जाना चाहिए। अग्रवाल ने कहा कि सरकार का बिना ब्रांड वाले खाने-पीने के सामानों को जीएसटी के दायरे में लाने का प्रस्ताव है और इस पर मंत्रियों के समूह की बैठक में आपसी सहमती भी बन चुकी है। इसे अन्तिम रूप देने के लिए जीएसटी परिषद की 28 और 29 जून 2022 को होने वाली बैठक में पेश किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि खाने-पीने के सामान एवं अनाज अत्यावश्यक वस्तुओं में आते हैं, जिसकी आवश्यकता हरेक व्यक्तियों की होता है चाहे वह गरीब हो, अमीर हो या मध्यम तबके के लोग हों और यही कारण है कि पूर्व की कर प्रणाली में भी इन वस्तुओं को कर-मुक्त की श्रेणी में रखा गया था। खाने-पीने की वस्तुओं पर टैक्स लगाने का सीधा आर्थिक भार देश के करीब 130 करोड़ लोगों पर पड़ेगा जो कि पहले से ही महंगाई के मार को झेल रहे हैं। आम आदमी की आमदनी कम हो रही है जबकि खर्च दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है।

चैंबर के अध्यक्ष ने कहा कि एक ओर प्रतिमाह जीएसटी राजस्व संग्रह के आंकड़े में वृद्धि हो रही है ऐसी परिस्थिति में खाने-पीने की वस्तुओं पर जीएसटी लगाने का प्रस्ताव उपयुक्त प्रतीत नहीं होता है। सरकार की यह सोच ‘‘सब का साथ सब का विकास’’ के विपरीत है। इन वस्तुओं को कर के दायरे में लाने से दूर-दराज में जो छोटे-छोटे व्यवसायी लोगों की आवश्यकता के अनुरूप वस्तुओं की आपूर्ति करते हैं उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। साथ ही गांवों-कस्बों में रहनेवाले निरक्षर लोगों और व्यवसायियों के बीच कर को लेकर विवाद होना भी संभव है।

अग्रवाल ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि जीएसटी कर कानूनों एवं नियमों की नये सिरे से समीक्षा की जाए और जहां कानून एवं नियमों में बदलाव वहीं कर दरों में विसंगतियों को समाप्त किया जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रियों के समूह की अनेक वस्तुओं को जीएसटी में प्राप्त छूटों को समाप्त करने तथा अनेक वस्तुओं की कर की दरों में वृद्धि करने की सिफारिश एकतरफा है क्योंकि उन्होंने केवल राज्य सरकारों का पक्ष ही जाना है और व्यापारियों से इस मामले पर कोई चर्चा तक नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी परिषद का कोई भी एकतरफा निर्णय प्रधानमंत्री के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के उद्देश्यों के विरुद्ध होगा।

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