100 करोड़ वैक्सीन डोज के जश्न में हमें नहीं बरतनी चाहिए ढिलाई, देश कोरोना की भीषण लहर देख चुका है: सोनिया गांधी

हमारे पहली पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों को इस बात का पूरा श्रेय और बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने कोविड-19 वैक्सीन की 100 करोड़ डोज़ का एक कीर्तिमान स्थापित किया। उनके साथ हमारे वैज्ञानिकों, रिसर्चर्स, मेडिकल प्रोफेशनल और वैक्सीन निर्माताओं को भी बधाई जिन्होंने कई किस्म की मुश्किलों और अवरोध के बावजूद देश के नागरिकों को कोविड-19 से बचा। इन्हीं लोगों के प्रयासों से शुरुआती महीनों की धीमी गति, सरकारी स्तर पर अनिर्णय और लोगों के बीच भ्रम के बाद वैक्सीनेशन के काम में तेजी आई।

100 करोड़ डोज़ लगाने का यह मील का पत्थर भारत के शोध और उत्पादन इंफ्रासट्रक्चर की कामयाबी का प्रतीक है जो दशकों की मेहनत से तैयार हुए। इस मौके पर हमें याद करना चाहिए कि पेटेंट एक्ट 1970 के कारण ही हमारे देश में दवा और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री को फलने-फूलने का मौका मिला और भारत पूरी दुनिया में एक सम्मानित वैक्सीन निर्माता के तौर पर स्थापित हुआ।

दूसरी लहर की भयावहता

लेकिन 100 करोड़ वैक्सीन डोज के जश्न में हमें अभी भी ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए। हमें अभी भी अच्छी तरह याद है कि किस तरह प्रधानमंत्री ने इस साल अप्रैल में मुख्यमंत्रियों से कहा था कि हमने बिना वैक्सीन के ही कोविड को हरा दिया है। इसके चंद महीने बाद ही देश भर में कोरोना की ऐसी भीषण लहर आई जिसने सरकार के सारे समय से पहले किए गए दावों की हवा निकाल दी। यह भीषण लहर सरकारी दावों से पैदा लापरवाही और कोविड नियमों की धज्जिया उड़ाती हजारों-लाखों की भीड़ के कारण देश पर कहर बनकर टूटी।

इतना ही नहीं कोरोना के कहर ने प्रधानमंत्री के उस दावे को भी खोखला और बेबुनियाद साबित कर दिया जो उन्होंने वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम में किया था कि भारत इस महामारी से निपटने के लिए तैयार था और इसने कोविड को हरा दिया। हालांकि तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट कोरोना की दूसरी लहर के भयावह रूप को लेकर दुनिया भर को आगाह कर रहे थे। लापरवाही का बोलबाला था, वैक्सीन हासिल करने को प्राथमिकता नहीं माना गया और वायरस इंफेक्शन फैलने की स्थिति में संभावित ऑक्सीजन की कमी दूर करने के कोई उपाय नहीं किए और इस सिलसिले में विशेषज्ञों की सलाह को नजरंदाज कर दिया गया। सरकार के दावों पर यकीन करते हुए आम लोगों ने भी लापरवाही बरती। और इसका नतीजा हम सबको मालूम है कि किस तरह लाखों भारतीयों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

100 करोड़ वैक्सीन की उपलब्धि के बाद प्रधानमंत्री ने जिस तरह प्रचार-प्रसार करना शुरु किया, उससे यह बात लोगों को दिमाग से मिटाने की कोशिश की गई कि दुनिया भर में सिर्फ दो ही ऐसे देश थे जिन्होंने 100 करोड़ वैक्सीन का आंकड़ा छुआ और हम उसमें दूसरे नंबर पर थे। कड़वी सच्चाई यह है कि देश पर कोरोना की दूसरी लहर कहट बनकर नहीं टूटती अगर सरकार ने लोगों की फिक्र की होती। दूसरी लहर के कठिन और भयावह दौर में देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कहीं नजर नहीं आए। और न ही उनकी तरफ से कोई बयान ही आया।

लेकिन जैसे ही हालत काबू में आए और स्थितियां सुधरीं तो दोनों नजर आने लगे। इन दोनों का यह रवैया बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि अचानक घोषित किए गए लॉकडाउन के बाद लाखों प्रवासी मजदूरों और कामगारों को उनके हाल पर बेसहारा छोड़ दिया गया था। जो सरकार की तरफ से आई इस विपदा से बचने के लिए पैदल सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव-घरों की तरफ चल दिए थे।